भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर श्री शक्तिकांत दास ने अपने वर्तमान कार्यकाल का अंतिम मुद्रा नीति वक्तव्य (मोनेटरी पॉलिसी स्टेट्मेंट) दिनांक 06 दिसम्बर 2024 को प्रातः 10 बजे जारी किया है। इस मुद्रा नीति वक्तव्य में रेपो दर में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं करते हुए इसे पिछले 22 माह से (अर्थात 11 मुद्रा नीति वक्तव्यों से) 6.5 प्रतिशत पर स्थिर रखा गया है। यह संभवत: भारतीय रिजर्व बैंक के इतिहास में सबसे अधिक समय तक स्थिर रहने वाली रेपो दर है। इस बढ़ी हुई रेपो दर का भारत के आर्थिक विकास पर अब विपरीत प्रभाव होता हुआ दिखाई दे रहा है क्योंकि वित्तीय वर्ष 2024-25 की द्वितीय तिमाही में भारत में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर घटकर 5.4 प्रतिशत तक नीचे आ गई है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रत्येक दो माह के अंतराल पर मुद्रा नीति वक्तव्य जारी किया जाता है, परंतु पिछले 11 मुद्रा नीति वक्तव्यों में रेपो दर में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं किया गया है। जबकि, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रा स्फीति की दर कुछ समय तक तो लगातार 6 प्रतिशत के सहनीय स्तर से नीचे बनी रही है।
भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्तीय वर्ष 2024-25 के दौरान उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित औसत मुद्रा स्फीति के अनुमान को 4.5 प्रतिशत से बढ़ाकर 4.8 प्रतिशत कर दिया है। इसका आश्य यह है कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा मुद्रा स्फीति की दर संभवत: वित्तीय वर्ष 2024-25 की तृतीय तिमाही में भी अधिक बनी रह सकती है। इसके पीछे खाद्य पदार्थों (विशेष रूप से फल एवं सब्जियों) की कीमतों में लगातार हो रही वृद्धि, एक मुख्य कारण जिम्मेदार हो सकता है। परंतु, क्या ब्याज दरों में वृद्धि कर खाद्य पदार्थों की कीमतों को नियंत्रित किया जा सकता है? उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा मुद्रा स्फीति की दर को आंकने में खाद्य पदार्थों का भार लगभग 40 प्रतिशत है। यदि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रा स्फीति में से खाद्य पदार्थों के भार को अलग कर दिया जाय तो यह आंकलन बनता है कि कोर पदार्थों की मुद्रा स्फीति की दर नियंत्रण में बनी हुई है। खाद्य पदार्थों की कीमतों को बाजार में फलों एवं सब्जियों की आपूर्ति बढ़ाकर ही नियंत्रित किया जा सकता है, न कि ब्याज दरों में वृद्धि कर। इस वर्ष मानसून का पूरे देश में विस्तार ठीक तरह से नहीं रहा है, कुछ क्षेत्रों में बारिश की मात्रा अत्यधिक रही है एवं कुछ क्षेत्रों बारिश की मात्रा बहुत कम रही है, जिसका प्रभाव खाद्य पदार्थों की उत्पादकता पर भी विपरीत रूप से पड़ा है, जिससे अंततः खाद्य पदार्थों की कीमतों में उच्छाल देखा गया है।
बाद के समय में, अच्छे मानसून के पश्चात भारत में आने वाली रबी मौसम की फसल बहुत अच्छी मात्रा में आने की सम्भावना है क्योंकि न केवल फसल के कुल रकबे में वृद्धि दर्ज हुई है बल्कि पानी की पर्याप्त उपलब्धता के चलते फसल की उत्पादकता में भी वृद्धि होने की पर्याप्त सम्भावना है। इन कारकों के चलते आगे आने वाले समय में खाद्य पदार्थों की एवं उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा मुद्रा स्फीति की दर निश्चित ही नियंत्रण के रहने की सम्भावना है। इससे, निश्चित ही रेपो दर को कम करने की स्थिति निर्मित होती हुई दिखाई दे रही है। साथ ही, अमेरिका सहित यूरोप के विभिन्न देशों में भी ब्याज दरों को लगातार कम करने का चक्र प्रारम्भ हो चुका है, जिसका प्रभाव विश्व के अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर भी पड़े बिना नहीं रहेगा।
दूसरी ओर, भारतीय रिजर्व बैंक ने वित्तीय वर्ष 2024-25 में सकल घरेलू उत्पाद में होने वाली वृद्धि दर के अनुमान को 7.2 प्रतिशत से घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया है। क्योंकि, यह वृद्धि दर द्वितीय तिमाही में घटकर 5.4 प्रतिशत की रही है। वित्तीय वर्ष 2024-25 की द्वितीय तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर के कम रहने के कई विशेष कारण रहे हैं। देश में लोकसभा चुनाव के चलते केंद्र सरकार को अपने पूंजीगत खर्चों एवं सामान्य खर्चों में भारी कमी करना पड़ी थी। इसके बाद विभिन्न राज्यों में विधानसभा चुनावों के चलते इन राज्यों द्वारा किए जाने वाले सामान्य खर्चों में अतुलनीय कमी की गई थी। जिससे अंततः नागरिकों के हाथों में खर्च करने लायक राशि में भारी कमी हो गई। दूसरे, इस वर्ष भारत में मानसून भी अनियंत्रित सा रहा है जिससे कृषि क्षेत्र में उत्पादन प्रभावित हुआ एवं ग्रामीण इलाकों में नागरिकों की आय में कमी हो गई। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न देशों में अस्थिरता बनी रही, जिसके कारण भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात प्रभावित हुए। इस अवधि में विनिर्माण के क्षेत्र एवं माइनिंग के क्षेत्र में उत्पादन भी तुलनात्मक रूप से कम रहा। उक्त कारकों के चलते भारत में वित्तीय वर्ष 2024-25 की द्वितीय तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर बहुत कम रही है। इस द्वितीय तिमाही में विभिन्न कम्पनियों के वित्तीय परिणाम भी बहुत उत्साहजनक नहीं रहे हैं। इनकी लाभप्रदता में आच्छानुरूप वृद्धि दर्ज नहीं हुई है। कम्पनियों के वित्तीय परिणाम उत्साहजनक नहीं रहने के चलते विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से सितम्बर, अक्टोबर एवं नवम्बर माह में 1.50 लाख करोड़ रुपए से अधिक की राशि निकाली है। जिससे भारतीय शेयर बाजार के निफ्टी सूचकांक में 3000 से अधिक अंकों की गिरावट दर्ज हुई है, निफ्टी सूचकांक अपने उच्चत्तम स्तर 26,400 से गिरकर 23,200 अंकों तक नीचे आ गया था। हालांकि अब यह पुनः बढ़कर 24,700 अंकों पर आ गया है और विदेशी संस्थागत निवेशकों ने एक बार पुनः भारतीय शेयर बाजार पर अपना भरोसा जताते हुए अपने निवेश में वृद्धि करना शुरू कर दिया है।
अब देश में कुछ महत्वपूर्ण राज्यों में विधान सभा चुनावों एवं लोक सभा चुनाव के सम्पन्न होने के बाद केंद्र सरकार एवं विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा अपने पूंजीगत खर्चों एवं सामान्य खर्चों में वृद्धि की जाएगी। साथ ही, भारत में त्यौहारी मौसम एवं शादियों के मौसम में भारतीय नागरिकों के खर्चों में अपार वृद्धि होने की सम्भावना है। त्यौहारी एवं शादियों का मौसम भी नवम्बर एवं दिसम्बर 2024 माह में प्रारम्भ हो चुका है। एक अनुमान के अनुसार नवम्बर माह में मनाए गए दीपावली एवं अन्य त्यौहारों पर भारतीय नागरिकों ने लगभग 5 लाख करोड़ रुपए से अधिक की राशि का व्यय किया है। वित्तीय वर्ष 2024-25 के जनवरी 2025 माह (13 जनवरी) में प्रयागराज में कुंभ मेला भी प्रारम्भ होने जा रहा है जो फरवरी 2025 माह (26 फरवरी) तक चलेगा। यह कुम्भ मेला प्रत्येक 12 वर्षों में एक बार प्रयागराज में लगता है। एक अनुमान के अनुसार इस कुम्भ मेले में प्रतिदिन एक करोड़ नागरिक पहुंच सकते हैं। इससे देश में धार्मिक पर्यटन में भी अपार वृद्धि होगी। उक्त सभी कारणों के चलते, भारत में उपभोक्ता खर्च में भारी भरकम वृद्धि दर्ज होगी जो अंततः सकल घरेलू उत्पाद में पर्याप्त वृद्धि को दर्ज करने के सहायक होगी। साथ ही, अक्टोबर 2024 माह में भारत से विविध उत्पादों एवं सेवा क्षेत्र के निर्यात में भी बहुत अच्छी वृद्धि दर दर्ज हुई है। इससे अंततः भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर 7 प्रतिशत से ऊपर बने रहने की प्रबल सम्भावना बनती नजर आ रही है।
साथ ही, भारतीय रिजर्व बैंक ने नकदी रिजर्व अनुपात में 50 आधार बिंदुओं की कमी करते हुए इसे 4.5 प्रतिशत से घटाकर 4 प्रतिशत कर दिया है। इससे 1.16 लाख करोड़ रुपए की राशि भारतीय रिजर्व बैंक से बैकों को प्राप्त होगी एवं इस राशि से बैंकिंग क्षेत्र में तरलता में सुधार होगा एवं बैंकों की कर्ज देने की क्षमता में भी वृद्धि होगी। अधिक ऋणराशि की उपलब्धता से व्यापार एवं उद्योग की गतिविधियों को बल मिलेगा जो देश के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि करने में सहायक होगा।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिकी डॉलर के लगातार मजबूत होने से बाजार में रुपए की कीमत लगातार गिर रही है और रुपए की कीमतों को नियंत्रण में रखने के उद्देश्य से भारतीय रिजर्व बैंक को बाजार में डॉलर की आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु अमेरिकी डॉलर को बेचना पड़ रहा है। जिससे, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार 70,500 करोड़ अमेरिकी डॉलर के उच्चत्तम स्तर से नीचे गिरकर 65,000 करोड़ अमेरिकी डॉलर के निचले स्तर पर आ गए हैं। साथ ही, रुपए की कीमत गिरकर 84.63 रुपए प्रति डॉलर के स्तर पर आ गई है। अतः यदि देश में व्यापारिक गतिविधियों में सुधार होता है एवं सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर्ज होती है तो विदेशी निवेश भी भारत में पुनः वृद्धि दर्ज करेगा एवं विदेशी मुद्रा भंडार भी अपने पुराने उच्चत्तम स्तर को प्राप्त कर सकेंगे। कुल मिलाकर भारत में अब ब्याज दरों में कमी करने का समय आ गया है।
लेखक -प्रहलाद सबनानी
हमारा भारत देश संस्कृति और ऐतिहासिक विरासत का जीता जागता अनुभव है। इसके इतिहास को सरल शब्दों में व्यक्त करना अत्यंत कठिन है। इससे भी अधिक कठिन है पांच हजार से अधिक वर्षों की सभ्यता के इतिहास को दस्तावेज के रूप में व्यक्त करना, जो देश की स्वतंत्रता के समय एक नए स्वतंत्र हुए राष्ट्र के भाग्य का मार्गदर्शन करने वाला हो। लेकिन आचार्य नंदलाल बोस केवल कलाकार नहीं थे और भारत के संविधान पर चित्रण उनके लिये केवल एक और कार्य नहीं था। संविधान में चित्रण के लिए उनकी दृष्टि हड़प्पा सभ्यता के समय से लेकर स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तक भारत की यात्रा का वर्णन करती है।
यह सभी चित्रण संविधान के अंतिम पृष्ठ पर सूचीबद्ध हैं और उन्हें बारह ऐतिहासिक काल में वर्गीकृत किया गया है: मोहनजोदड़ो काल, वैदिक काल, महाकाव्य काल, महाजनपद और नंद काल, मौर्य काल, गुप्त काल, मध्यकालीन काल, मुस्लिम काल, ब्रिटिश काल, भारत का स्वतंत्रता आंदोलन, स्वतंत्रता के लिए क्रांतिकारी आंदोलन और प्राकृतिक विशेषताएँ।
संविधान की शुरुआत हमारे राष्ट्रीय प्रतीक के चित्रण से होती है। नंदलाल बोस इस बात को लेकर बहुत स्पष्ट थे कि प्रतीक में शेर बिल्कुल असली शेरों की तरह दिखें, उनकी चाल और चेहरे के हाव-भाव सही हों और आयु के हिसाब से उनमें बदलाव हो। राष्ट्रीय प्रतीक के डिजाइनर दीनानाथ भार्गव, जो उस समय कला भवन में एक युवा छात्र थे, इस कलाकृति को चित्रित करने से पहले शेरों के हाव-भाव, शारीरिक भाषा और तौर-तरीकों का अध्ययन करने के लिए महीनों तक कोलकाता चिड़ियाघर गए। प्रस्तावना पृष्ठ और कई अन्य पृष्ठों को बेहर राममनोहर सिन्हा ने डिजाइन किया था। नंदलाल बोस ने बिना किसी बदलाव के प्रस्तावना हेतु सिन्हा जी की बनाई कलाकृति का समर्थन किया। इस पृष्ठ पर निचले दाएं कोने में देवनागरी में सिन्हा का संक्षिप्त हस्ताक्षर राम है।
संविधान की प्रस्तावना एक हाथ से लिखा हुआ लेख है जो आयताकार बॉर्डर से घिरा हुआ है। बॉर्डर के चार कोनों में चार पशुओं को दर्शाया गया है। दर्शाए गए चार जानवर भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के आधार से लिए गए हैं। बॉर्डर की कलाकृति में कमल की आकृति प्रमुखता से दिखाई देती है। कमल की आकृति बॉर्डर कलाकृति में प्रमुखता से दिखाई देती है।
संविधान का प्रत्येक भाग एक चित्र से आरंभ होता है और अलग-अलग पृष्ठों पर अलग-अलग बॉर्डर डिज़ाइन दर्शाए गए हैं। कलाकारों के हस्ताक्षर चित्र पर और बॉर्डर के पास दिखाई देते हैं जो इस प्रोजेक्ट में सभी के सहयोग को दर्शाता है। अनेक पृष्ठों पर कई हस्ताक्षर हैं जो बंगाली, हिंदी, तमिल और अंग्रेजी में दिखाई देते हैं। भारत के संविधान के भाग 19 में विविध विषयों से संबंधित एक चित्र है जिसमें नेताजी सैन्य पोशाक में अपने सैनिकों से घिरे हुए सलामी दे रहे हैं। नंदलाल बोस के हस्ताक्षर चित्रण पर दिखाई देते हैं और ए. पेरुमल के हस्ताक्षर पृष्ठ के बाएं निचले कोने पर दिखाई देते हैं। वे कला को लोगों तक ले जाने वाले कलाकार के रूप में प्रसिद्ध हुए। वे शांतिनिकेतन के गाँवों में जाते और संथाल घरों की दीवारों को जानवरों, पक्षियों और पेड़ों वाली प्रकृति की थीम से सजाते। वे शांतिनिकेतन के कला भवन में चार दशकों से अधिक समय तक नंदलाल बोस जैसे महान कलाकारों के साथ रहे और काम किया, उन्हें स्नेह से 'पेरुमलदा' कहा जाता था।
संविधान का भाग VI, जो प्रथम अनुसूची के भाग A में राज्यों से संबंधित है, वह ध्यान में बैठे भगवान महावीर की समृद्ध रंगीन चित्र से शुरू होता है, जिसमें वे अपनी आँखें बंद करके और हथेलियाँ एक दूसरे पर टिकाकर बैठे हुए हैं। भगवान महावीर के दोनों ओर एक-एक पेड़ हैं और फ्रेम में एक मोर भी दिखाई दे रहा है जो प्रकृति में सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व को दर्शाता है। यह मूल संविधान के कुछ रंगीन चित्रों में से एक है। रंगीन चित्रों में जमुना सेन और नंदलाल बोस के हस्ताक्षर हैं। इस पृष्ठ पर बॉर्डर डिज़ाइन में राजनीति नामक कलाकार के हस्ताक्षर भी हैं।
भारतीय संविधान का भाग 15 चुनावों पर केंद्रित है। इस पृष्ठ पर दिए गए चित्रों में भारत के दो वीर सपूत छत्रपति शिवाजी महाराज और गुरु गोविंद सिंह को दिखाया गया है। इस पृष्ठ पर दिए गए चित्र धीरेंद्र कृष्ण देब बर्मन द्वारा बनाए गए हैं, जो त्रिपुरा राजघराने के सदस्य थे और रवींद्रनाथ टैगोर और नंदलाल बोस के साथ उनके घनिष्ठ संबंध थे। बॉर्डर डिज़ाइन पर कृपाल सिंह शेखावत के हस्ताक्षर हैं, जो भारत के एक प्रसिद्ध कलाकार और मिट्टी के बर्तन बनाने वाले थे, जिन्हें जयपुर की प्रतिष्ठित ब्लू पॉटरी की कला को पुनर्जीवित करने के लिए जाना जाता है।
शांतिनिकेतन में ललित कला संस्थान कला भवन ने भारत और दुनिया के सभी कोनों से छात्रों और कलाकारों को आकर्षित किया, इस प्रकार विभिन्न प्रभावों को समाहित करते हुए उत्कृष्टता की निरंतर खोज करते हुए एक इकोसिस्टम निर्मित किया और अंत में, एक अनूठी भारतीय शैली और कला निर्मित की। इस पर काम करने वाले कई कलाकारों ने अपने करियर में महान ऊंचाइयों को हासिल किया, लेकिन इस परियोजना के समय शांतिनिकेतन के छात्र और सहयोगी ही थे जो अपने श्रद्धेय ‘मास्टर मोशाय’ नंदलाल बोस के सपने को जीवंत करने के लिए प्रयत्नशील थे।
संविधान में चित्रों की प्रेरणा भारत के विशाल इतिहास, भौतिक परिदृश्य, पौराणिक चित्र और स्वतंत्रता संग्राम में निहित है। भारत के संविधान का भाग 13 ‘भारतीय क्षेत्र में व्यापार, वाणिज्य और उनके परस्पर संबंधो’ से संबंधित है। इस पृष्ठ पर दिया गया चित्रण महाबिलापुरम में स्मारकों के समूह का हिस्सा है जो यूनेस्को द्वारा अंकित विश्व धरोहर स्थल है। ‘गंगा का अवतरण’ एक बड़ी, खुली हवा में बनी चट्टान की नक्काशी वाली मूर्ति है जो स्वर्ग से धरती पर गंगा नदी के उतरने के कथा को पत्थर में दर्शाती है। नंदलाल बोस के हस्ताक्षर चित्र पर दिखाई देते हैं और जमुना सेन का नाम बॉर्डर के बाएं निचले कोने पर दिखाई देता है।
भाग 3 जो मौलिक अधिकारों से संबंधित है, उसमें रामायण का एक दृश्य दिखाया गया है। इस पृष्ठ के बॉर्डर पर जमुना सेन के हस्ताक्षर हैं। भाग 4 जो राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों से संबंधित है, उसमें महाभारत का एक दृश्य दिखाया गया है। बानी पटेल और नंदलाल बोस के नाम दाईं ओर नीचे दिए गए चित्रण पर दिखाई देते हैं और विनायक शिवराम मसोजी का नाम बॉर्डर के बाएं कोने पर दिखाई देता है।
संविधान का भाग 7 ‘पहली अनुसूची के भाग बी में शामिल राज्यों’ से संबंधित है। इस खंड की शुरुआत में दिए गए चित्रण में सम्राट अशोक द्वारा बौद्ध धर्म के प्रसार को दर्शाया गया है। उन्हें हाथी पर सवार दिखाया गया है, जो सभी तरह के साज-सज्जा से सुसज्जित है और बौद्ध भिक्षुओं से घिरा हुआ है। यह चित्रण अजंता की शैली में है, जिसमें भिक्षुओं को शरीर के ऊपरी हिस्से को बिना वस्त्रों और आभूषणों के साथ दिखाया गया है। यह चित्रण नंदलाल बोस द्वारा किया गया था, जिनका काम अजंता भित्तिचित्रों में पाई जाने वाली कलात्मक परंपराओं से बहुत प्रभावित था। चित्रण के निचले बाएँ भाग पर ए. पेरुमल का नाम भी दिखाई देता है। बॉर्डर डिज़ाइन में ब्योहर राममनोहर सिन्हा के हस्ताक्षर हैं, जिन्होंने प्रस्तावना और कई अन्य पृष्ठों को भी डिज़ाइन किया था। यहाँ उन्होंने हिंदी में राममनोहर के रूप में हस्ताक्षर किए हैं। यह संविधान के उन कुछ पन्नों में से एक है, जिस पर नंदलाल बोस और उनके सबसे वरिष्ठ छात्र ब्योहर राममनोहर सिन्हा दोनों के नाम हैं।
भारत का संविधान इस मायने में अनूठा है कि यह मूल रूप से एक हस्तलिखित दस्तावेज़ था। इसे अंग्रेजी में प्रेम बिहारी रायज़ादा और हिंदी में वसंत के. वैद्य ने सुलेखित किया था। रायज़ादा ने प्रवाहपूर्ण इटैलिक शैली का इस्तेमाल किया और सुलेख की कला अपने दादा से सीखी। संविधान हॉल (जिसे अब कॉन्स्टिट्यूशन क्लब ऑफ़ इंडिया के नाम से जाना जाता है) के एक कमरे में काम करते हुए, उन्होंने छह महीने के दौरान दस्तावेज़ तैयार किया। उन्होंने इसे लिखते समय सैकड़ों पेन निब का इस्तेमाल किया। भारत के संविधान के अंग्रेजी संस्करण के सुलेखक प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा (प्रेम) के हस्ताक्षर दस्तावेज़ के हर पृष्ठ पर दिखाई देते हैं। राष्ट्रीय महत्व की इस परियोजना को शुरू करने के लिए उन्होंने यही एकमात्र अनुरोध किया था।
भारत का संविधान एक मौलिक कला ग्रंथ है जो समय की कसौटी पर खरा उतरा है। भारतीय संविधान में कलात्मकता भारत के बहुस्तरीय इतिहास को दर्शाती है और सामाजिक सांस्कृतिक, पौराणिक, क्षेत्रीय, आध्यात्मिक, भौतिक परिदृश्य तथा अन्य कारकों के प्रति श्रद्धांजलि है जो भारत को एक अद्वितीय और जीवंत अनुभव बनाते हैं। यह एक ऐसे राष्ट्र की वास्तविकता को दर्शाता है जो अपने प्राचीन अतीत को स्वीकार करता है, विविधता में एकता का उत्सव मनाता है और भविष्य की ओर देखता है।
लेखक - गजेंद्र सिंह शेखावत
उन्हें भारतीय संविधान के मुख्य शिल्पकार के रूप में जाना जाता है। उनके प्रयासों ने न केवल समाज में व्याप्त भेदभाव और अन्याय को समाप्त करने में मदद की, बल्कि भारत के कमजोर और वंचित वर्गों को सशक्त बनाया।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
डॉ. अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू में एक महार जाति के परिवार में हुआ, जो उस समय "अछूत" मानी जाती थी। उनके पिता रामजी मालोजी सकपाल ब्रिटिश भारतीय सेना में सूबेदार थे। भीमराव ने जातिगत भेदभाव का सामना बचपन से ही किया, लेकिन उन्होंने इसे अपनी शिक्षा में बाधा नहीं बनने दिया।
डॉ. अंबेडकर ने कोलंबिया विश्वविद्यालय (अमेरिका) से अर्थशास्त्र में एमए और पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। इसके बाद वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स गए, जहां से उन्होंने डी.एससी. किया। उन्होंने कानून की पढ़ाई भी की और बैरिस्टर की डिग्री प्राप्त की।
सामाजिक सुधार और "अछूतों" के लिए संघर्ष
डॉ. अंबेडकर का जीवन समाज में व्याप्त जातिगत भेदभाव को समाप्त करने के लिए समर्पित था। उन्होंने दलितों (तत्कालीन "अछूत") के अधिकारों और सम्मान के लिए लड़ाई लड़ी।
महाड़ सत्याग्रह (1927): डॉ. अंबेडकर ने दलितों के लिए सार्वजनिक तालाबों और पानी के स्रोतों तक पहुंच का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए यह आंदोलन चलाया।
काला पानी विरोध: उन्होंने हिंदू धर्म में प्रचलित छुआछूत और जाति व्यवस्था के विरुद्ध आवाज उठाई।
डॉ. अंबेडकर ने "बहिष्कृत भारत" और "मूकनायक" जैसी पत्रिकाओं का संपादन किया, जिनके माध्यम से उन्होंने दलित समुदाय की आवाज को बुलंद किया।
संविधान निर्माण व बौद्ध धर्म की ओर झुकाव
भारत रत्न डॉ. अम्बेडकर पुरस्कार क्यों दिया जाता है ?
डॉ. अंबेडकर का निधन 6 दिसंबर 1956 को नई दिल्ली में हुआ। उनका जीवन और कार्य आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरित करता है। उन्हें भारतीय समाज में समानता, न्याय और स्वतंत्रता का प्रतीक माना जाता है।
डॉ. अंबेडकर को 1990 में मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अपने विचारों, संघर्षों और कृतियों के माध्यम से भारत को एक नई दिशा दी। उन्होंने न केवल दलितों बल्कि समाज के हर वर्ग के उत्थान के लिए अपना जीवन समर्पित किया। उनका योगदान भारतीय लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के इतिहास में अमर है।
अग्हन शुक्ल पंचमी
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी ।लेकिन नियमित शाखाएँ लगभग डेढ़ वर्ष बाद आरंभ हुईं। देवरसजी संघ की प्रारंभिक शाखा के स्वयंसेवक बने । तब उनकी आयु मात्र ग्यारह वर्ष थी । इस शाखा का शुभारंभ संघ के संस्थापक डॉक्टर हेडगेवार जी ने स्वयं किया था । स्वयंसेवकों के इस प्रथम शाखा में बालासाहब के साथ केशवराव वकील, त्र्यंबक झिलेदार, अल्हाड़ अंबेडकर, बापू रावदिवाकर, नरहरि पारखी, बाली यशकुण्यवर,, माधवराव मुले और एकनाथ रानाडे भी थे । बाला साहब बचपन से बहुत कुशाग्र और तीक्ष्ण बुद्धि थे । विषय को सुनकर प्रस्तुतिकरण करने की उनमें अद्भुत क्षमता थी । इसलिये वे इस टोली के स्वभाविक समन्वयक के रूप में उभरे । डाॅक्टर जी स्वयं इस शाखा के शिक्षक और संचालक थे। इसलिए बालासाहब सहित इस पूरी टोली की संघ शिक्षा डॉक्टर जी के माध्यम से ही हुई । देवरस जी के विषय प्रस्तुतिकरण में भी डॉक्टरजी की झलक साफ होती थी । समय के साथ संघ की संकल्पना, शिक्षा, और डाक्टरजी के मार्गदर्शन से बालासाहब देवरस जी इतने प्रभावित हुये कि संघ को माध्यम बनाकर अपना पूरा जीवन राष्ट्र और संस्कृति की सेवा में समर्पित कर दिया । देवरसजी ने संघ की स्थापना का उद्देश्य, कार्यशैली, सिद्धांत और व्यहवार सब डॉक्टर जी से ही समझा था । इसलिये देवरस जी के व्यवहार और प्रबोधन में डॉक्टरजी झलक सदैव मिलती थी । देवरसजी द्वारा प्रस्तुत विषयों में गहराई और व्यापकता कुछ ऐसी होती थी कि श्रोता वर्ग में संघ के स्वयं सेवक हों अथवा समाज के प्रबुद्ध जन, सभी एकाग्र होकर सुनते थे। देवरसजी एक प्रचारक से लेकर सरसंघचालक तक लगभग सभी दायित्वों पर रहे । और भारत के हर क्षेत्र की यात्रा की । उन्होंने 6 जून 1973 को सरसंघचालक के रूप में संघ प्रमुख का दायित्व संभाला था । 5 जून1973 को संघ के द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य ‘गुरुजी’ का निधन हुआ। देवरसजी तब आंध्रप्रदेश के प्रवास पर थे । तब उनके पास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह का दायित्व था । उन्हें प.पू. गुरुजी के निधन सूचना मिली वे नागपुर पहुँचे। और गुरुजी की अंतिम इच्छा के अनुरूप देवरस जी ने "सरसंघचालक" का दायित्व संभाला। संघ की परंपरानुसार प.पू. गुरूजी संसार से विदा होने से पहले एक पत्र लिखकर देवरसजी को अपना उत्तराधिकार सौंप गये थे। वे लगभग दो दशक तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक रहे । जब उन्होंने सरसंघचालक का पदभार संभाला तब उनकी आयु 58 वर्ष थी । मधुमेह रोग ने भी उन्हें प्रभावित कर लिया था । फिर भीषअपने शरीर और स्वास्थ्य की बिना परवाह किये उन्होंने देश व्यापी यात्रा की । उन्हीं दिनों भारत में मँहगाई विरोधी आँदोलन तेज हुआ । यह आँदोलन जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में हो रहा था । लेकिन व्यक्तिगत तौर हर क्षेत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता सहभागी हो रहे थे ।
कुछ परंपराओं को व्यवहारिक बनाया
लेखक - रमेश शर्मा
आमतौर पर बुढ़ापा को अशक्तता, रोग, व्याधि और दुर्बलता आदि के कारण जीवन का सबसे भयावह दौर माना जाता है। परिवार की संरचना में बदलाव और भागदौड़ भरी ज़िंदगी में बुढ़ापे की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। परंतु जीवन शैली में सुधार, दृष्टिकोण में सकारात्मकता, सावधानी बरतने और सहयोग लेने से इस दुखदायी अवधि को बहुत हद तक एक भाग्यशाली उम्र के रूप में बदला जा सकता है। जीवन के नियम आपके अपने हाथ में हैं इसलिए अच्छी तरह जिएँ और सब कुछ शांति से स्वीकार करें।
यह भी उल्लेखनीय है कि स्वास्थ्य सुविधाओं और खानपान में जरूरी पोषक तत्वों पर ध्यान देने के साथ जीवन की प्रत्याशा (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) निश्चित रूप से बढ़ी है। बुढ़ापे के डर और उसे दूर रखने के उपाय की ओर अब लोग बहुत ध्यान देने लगे हैं। कुछ दिनों पहले जापान के एक मनोचिकित्सक हिडेकी वाडा ने "80-ईयर-ओल्ड वॉल" नामक की एक रोचक पुस्तक प्रकाशित की जो बड़ी लोकप्रिय हुई है और पाठकों के बीच तहलका मचा दिया है। अपने तीन दशकों से कुछ ज्यादा लंबे चिकित्सकीय जीवन में उन्होंने कई हज़ार रोगियों का सफल उपचार किया। यह पुस्तक अच्छे स्वास्थ्य के साथ शतायु होने के गुर बताती है। गौरतलब है कि जापान में “औसत स्वस्थ जीवन प्रत्याशा” पुरुषों के लिए 72.68 वर्ष और महिलाओं के लिए 75.38 वर्ष आंकी गई है। "औसत जीवन प्रत्याशा" की बात करें तो यह जापानी पुरुष के लिए 81.64 वर्ष और महिलाओं के लिए 87.74 वर्ष है। यदि "औसत जीवन प्रत्याशा" में से "औसत स्वस्थ जीवन प्रत्याशा" का मूल्य घटा दें तो पुरुषों के पास लगभग 9 वर्ष और महिलाओं के पास लगभग 12 वर्ष का समय बचता है। यही वह ख़ास अवधि है जब एक बुजुर्ग को दूसरों द्वारा देखभाल की ज़्यादा ज़रूरत होती है। इस अवधि को कैसे कम किया जाए, इस प्रश्न का हल ढूँढ़ते हुए डॉ. वाडा ने कुछ मार्गदर्शक नियम और अभ्यास खोजे हैं। उनके सुझाव ऐसे हैं जिनसे बुढ़ापे को एक संतोषजनक और तृप्तिदायी अवधि में रूपांतरित किया जा सकता है।
डॉ. वाडा कहते हैं कि बुजुर्गों को बार-बार नींद की गोलियां नहीं लेनी चाहिए क्योंकि बढ़ती उम्र के साथ नींद में कमी आना स्वाभाविक घटना है। जब सोना हो तब सो जाओ, जब उठना हो तब उठो, यह बुजुर्गों का विशेषाधिकार है। ऐसे ही कोलेस्ट्रॉल का स्तर भी कोई ज़्यादा चिंता की बात नहीं है, क्योंकि कोलेस्ट्रॉल शरीर के लिए प्रतिरक्षा कोशिकाओं के लिए ज़रूरी कच्चा माल होता है। जितनी अधिक मात्रा में ये कोशिकाएँ मौजूद होंगी, कैंसर का खतरा उतना ही कम होगा। इसके अलावा, पुरुष हार्मोन का एक हिस्सा कोलोस्ट्रॉल से बना होता है। यदि कोलेस्ट्रॉल का स्तर बहुत कम है, तो पुरुषों का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य डावाँडोल बना रहेगा। यही बात रक्तचाप के बारे में भी है। जब रक्तचाप लगभग 150 तक पहुँच जाता है तो रक्त वाहिकाएँ फट जाती हैं जो ख़तरनाक है। यह कुपोषित लोगों में होता है। लेकिन अब कुपोषण बहुत कम हो गया है इसलिए भले ही रक्तचाप 200 से अधिक हो, इससे रक्त वाहिकाएँ फटने की गुंजाइश काम हो गई है।
डॉ. वाडा ने अपने अनुभव और अनुसंधान से 80 वर्षीय लोगों के "भाग्यशाली लोग" बनने के अनेक रहस्यों को उजागर किया है। उनका पहला सुझाव हर स्तर पर सक्रियता बनाए रखने को लेकर है। बुजुर्गों को खूब चलना चाहिए, धूप सेंकनी चाहिए और ऐसे व्यायाम करने चाहिए जिनसे शरीर न अकड़े। उनको मनपसंद काम करना चाहिए। चाहे कुछ भी हो उनको हर समय घर पर पड़े नहीं रहना चाहिए। उन्हें कई बार थोड़ा-थोड़ा आहार लेते रहना चाहिए। आप जितनी बार चबाएंगे, शरीर और मस्तिष्क उतना ही ऊर्जावान रहेगा। आराम-आराम से आसानी से सांस लेनी चाहिए। जब किसी कारणवश चिढ़ लगे तो गहरी साँस लेना चाहिए। गर्मियों में एयर कंडीशनर का उपयोग करते हुए ज़्यादा से ज़्यादा पानी पीना चाहिए।
बुढ़ापे में लोगों में भूलने की समस्या पैदा होती है। यह समझना ज़रूरी है कि उम्र बढ़ने के कारण ऐसा नहीं होता बल्कि मस्तिष्क को लंबे समय तक उपयोग में न लाने से ऐसा होता है। बुजुर्गों को अधिक दवाएँ भी नहीं लेनी चाहिए। रक्तचाप और रक्त शर्करा-स्तर को जानबूझकर कम करने की ज़रूरत नहीं है। वे जो चाहें खाएं, थोड़ा स्थूलकाय होना ठीक है। अगर नींद नहीं आ रही है तो उसके लिये खुद को मजबूर न करें। बीमारी से अंत तक लड़ने के बजाय, उसके साथ सह-अस्तित्व में रहना बेहतर युक्ति है। खुश करने वाली चीज़ें करते रहना मस्तिष्क की गतिविधि को सुचारू बनाए रखने के लिए ज़्यादा ठीक साबित हुआ है। सीखना बंद करते हुए आदमी बूढ़ा होने लगता है। कार्य की आदतों को लेकर डॉ. वाडा का सुझाव है कि हर काम सावधानी से करना चाहिए। ऐसे लोगों से दूर ही रहना चाहिए जिनसे उनको नफरत हो। बहुत ज़्यादा या हर समय टीवी न देखें। खानपान में ताजा फल और सलाद का अधिक उपयोग लाभकर होता है।
परोपकार का जीवन दर्शन सबसे अच्छा है। इसलिए ऐसे काम करें जो दूसरों के लिए अच्छे हों। डॉ. वाडा की मानें तो प्रसिद्धि पाना ठीक है पर उसके लिए लालची नहीं होना चाहिए। आदमी के पास कुछ भी है वह बहुत अच्छा है और उसका आनंद उठाना चाहिए। जो परेशान करने वाली चीजें होती हैं, वे उतनी ही दिलचस्प होती हैं और अवसर देती हैं। चूँकि इच्छा दीर्घायु का स्रोत है इसलिए हमें आशावादी बने रहना चाहिए। बुढ़ापा तब "भाग्यशाली उम्र" बन जाता है। इसे अच्छी तरह जीने की ज़रूरत है। इत्मीनान से जीयें, बिना किसी हड़बड़ी के।
लेखक - गिरीश्वर मिश्र
