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दक्षिण विधायक अग्निमित्र पाल ने सिंगूर और नंदीग्राम को राजनीतिक प्लेटफार्म बताया

Date : 01-Feb-2026

 आसनसोल, 01 फ़रवरी । ममता बनर्जी ने सिंगूर के लोगों को सिर्फ़ धोखा ही नहीं दिया, बल्कि योजना बनाकर उनका इस्तेमाल भी किया है। आंदोलन के दिनों में सिंगूर उनकी राजनीतिक सत्ता का मुख्य गंतव्य था। जहां उन्होंने राजनीतिक विकास किया। लेकिन, सत्ता में आने के बाद उन्होंने उस मिट्टी को अनाथ बना दिया। सिंगूर में खेती की कोई गारंटी नहीं है, उद्योग का कोई भविष्य नहीं है। सिर्फ़ टूटे वादों की आह है।

नंदीग्राम के मामले में भी तस्वीर अलग नहीं है। वहां भी लोगों का खून, डर और संघर्ष ही राजनीतिक पूंजी थी। आसनसोल दक्षिण विधायक अग्निमित्र पाल ने शनिवार रात फेसबुक पर किए गए पोस्ट में यह बातें कही।

पोस्ट में उन्होंने लिखा कि सत्ता में आने से पहले ममता बनर्जी ने ज़ोरशोर से कहा था कि जिन अफ़सरों ने गोली चलाई थी, जिन पर गंभीर आरोप थे, उन्हें सज़ा दिलाएंगी। सत्ता में आने के बाद, सज़ा के बदले उन्हें राजनीतिक शरण देते हुए पदोन्नति और ज़रूरी ज़िम्मेदारियां दी।

सिंगूर आंदोलन के दौरान, हुगली ज़िले के सुपरिटेंडेंट ऑफ़ पुलिस के तौर पर सुप्रतिम सरकार ने किसानों के ख़िलाफ़ दमन नीति लागू की। अपनी ज़मीन बचाने निकले किसानों पर केस किए गए, लाठीचार्ज किया गया, गिरफ़्तारियां की गईं, कुछ भी नहीं छोड़ा गया। महिलाओं को भी नहीं बक्शा गया। सिंगूर क्रैकडाउन की तरह ही नंदीग्राम में भी एक खूनी चैप्टर लिखा गया।

अपने पोस्ट में उन्होंने आगे लिखा कि नंदीग्राम फायरिंग की घटना में जिन लोगों पर आरोप लगे थे, जिनके नाम जांच में सामने आए थे—उनमें उस समय के आइजी अरुण गुप्ता, डीआइजी एन रमेश, एडिशनल एसपी सत्यजीत बनर्जी, देबाशीष बोराल और नंदीग्राम पुलिस स्टेशन के ओसी शेखर रॉय शामिल थे। दोनों मामलों सिंगूर और नंदीग्राम में इन अफ़सरों की भूमिका सवालों के घेरे में आई। उस समय ममता बनर्जी सिंगूर और नंदीग्राम के लोगों के साथ खड़ी थीं और कहा था कि अगर वह सत्ता में आईं तो इन ज़ुल्म करने वालों को सज़ा देंगी। ये दोनों आंदोलन उनकी राजनीति के मुख्य हथियार थे। सिंगूर और नंदीग्राम के बिना उनकी तरक्की की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

अपने पोस्ट में अग्निमित्र पाल ने लिखा कि सिंगूर और नंदीग्राम के लोगों का संघर्ष इतिहास के पन्नों में दफ़न हो रहा है और ज़ुल्म के किरदार सत्ता की रोशनी में उभर रहे हैं।

यही इस राज का सबसे बड़ा सच है। लोग नहीं बदलते, इतिहास नहीं बदलता। सिर्फ शासक का चेहरा और भाषा बदलती है।


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