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अलविदा उस्ताद...जाकिर हुसैन सैन फ्रांसिस्को में सुपुर्द-ए-खाक

Date : 20-Dec-2024

न्यूयॉर्क, 20 दिसंबर । विश्व प्रसिद्ध तबला वादक जाकिर हुसैन को शोकाकुल परिवार और प्रशंसकों ने अंतिम विदाई दी। उन्हें सैन फ्रांसिस्को में 19 दिसंबर को सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया। प्रसिद्ध ताल वादक ए. शिवमणि एवं अन्य नामचीन कलाकार उन्हें श्रद्धांजलि देने पहुंचे। सभी ने नम आंखों से उस्ताद जाकिर हुसैन की विदाई के अंतिम क्षणों में ड्रमों पर प्रदर्शन किया।

73 वर्षीय उस्ताद जाकिर हुसैन का फेफड़ों की बीमारी इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस से उत्पन्न जटिलताओं के कारण पिछले दिनों सैन फ्रांसिस्को के एक अस्पताल में निधन हो गया था। प्रसिद्ध तबला वादक अल्ला रक्खा के पुत्र जाकिर हुसैन को तबले की थाप को भारतीय शास्त्रीय संगीत की सीमाओं से परे जैज और पश्चिमी शास्त्रीय संगीत तक पहुंचाने का श्रेय है।

उस्ताद के निधन की सूचना पर भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक्स हैंडल के माध्यम से परिवार को भेजे शोक संदेश में कहा था, महान तबला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन के निधन से बहुत दुख हुआ। वह भारतीय शास्त्रीय संगीत में क्रांति के वाहक हैं। उन्होंने अपनी थाप से तबले को वैश्विक पहचान दिलाई। भारतीय संगीत को विश्व संगीत से जोड़ने में मदद की। वे सांस्कृतिक एकता के प्रतीक हैं।

अब दुनिया में जब भी तबले का जिक्र होगा तो उस्ताद जाकिर हुसैन का नाम प्रमुखता से लिया जाएगा। उन्होंने न सिर्फ अपने पिता उस्ताद अल्ला रक्खा खां की पंजाब घराने (पंजाब बाज) की विरासत को आगे बढ़ाया, बल्कि तबले के शास्त्रीय वादन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ले गए। उस्ताद जाकिर हुसैन को संगीत की दुनिया का सबसे बड़ा ग्रैमी अवॉर्ड 1992 में द प्लेनेट ड्रम और 2009 में ग्लोबल ड्रम प्रोजेक्ट के लिए मिला। इसके बाद 2024 में उन्हें तीन अलग-अलग संगीत एलबम के लिए एक साथ तीन ग्रैमी मिले। साल 1978 में जाकिर ने कथक नृत्यांगना एंटोनिया मिनीकोला से शादी की। उनकी दो बेटियां हैं- अनीसा कुरैशी और इसाबेला कुरैशी।

उन्होंने 1983 में फिल्म हीट एंड डस्ट से अभिनय के क्षेत्र में भी कदम रखा। उस्ताद ने इसके बाद 1988 में द परफेक्ट मर्डर, 1992 में मिस बैटीज चिल्डर्स और 1998 में साज फिल्म में अभिनय किया। वो शास्त्रीय प्रस्तुति के दौरान बीच-बीच में अपने तबले से कभी डमरू, कभी शंख तो कभी बारिश की बूंदों जैसी अलग-अलग तरह की ध्वनि निकालते थे। वो कहा करते थे कि शिवजी के डमरू से कैलाश पर्वत से जो शब्द निकले, गणेश जी ने वही शब्द लेकर उन्हें ताल की जुबान में बांधा। हम सब तालवादक, तालयोगी या तालसेवक उन्हीं शब्दों को अपने वाद्य पर बजाते हैं। गणेश जी हमारे कुलदेव हैं।


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