इन्द्रियाणि च संयम्य, बकवत्पण्डितो नरः ।
देशकाल बलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत् ॥
आचार्य बगुले से सोख के बारे में बता रहे हैं। बगुले के समान इन्द्रियों को वश देशका एवं बल को जानकर विद्वान अपना कार्य सफल करें।
भाया है कि बगुला सब कुछ भूलकर एकटक मछली को हो देखता रहता है और कालते हो उसे इशफ्ट लेता है। मनुष्य को भी काम करते समय अन्य सब बातों को भूतका केवात देश, काल और बल का विचार करना चाहिए।
देशा-इस स्थान पर इस काम को करने से क्या लाभ होगा? यहां इस वस्तु की कितनी है? इत्यादि पर विचार करना देश-स्थान पर विचार करना है। काल-समय, कौन-सा समय किस काम के लिए अनुकूल होगा? तथा बल-मेरी शक्ति कितनी है, मेरे पास कितना पैसा या अन्य साधन कितने हैं? इन सब बातों पर काम आरम्भ करने से पहले विचार कर लेना चाहिए।
मातृभूमि! तेरे चरणों में पहले ही मैं अपना मन अर्पित कर चुका हूँ। देश-सेवा ही ईश्वर-सेवा है, यह मानकर मैंने तेरी सेवा के माध्यम से भगवान की सेवा की।
– सावरकर
आज स्वतंत्रता वीर सावरकर का जन्म दिवस है। सावरकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे जीनियस क्रांतिकारियों और विचारकों में से एक थे। उन्होंने "द वॉर ऑफ इंडियन इंडिपेंडेंस: 1857" लिखकर यह सिद्ध किया कि 1857 का संग्राम भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम था, जिसे अंग्रेज़ इतिहासकारों ने केवल ‘सिपाही विद्रोह’ कहकर कमतर आँका।
पुणे के प्रतिष्ठित फर्ग्यूसन कॉलेज से स्नातक और लंदन से ‘बार एट लॉ’ की पढ़ाई पूरी करने वाले सावरकर इतिहासकार, लेखक, कवि, नाटककार और गहरे चिंतनशील विचारक थे। उन्होंने 'हिंदुत्व' की अवधारणा प्रस्तुत की और कहा कि भारत की पुण्यभूमि पर जन्मा हर व्यक्ति हिंदू है, चाहे वह किसी भी पंथ का अनुयायी क्यों न हो।
जब महात्मा गांधी ने राजनीति में प्रवेश किया, तब सावरकर का प्रभाव और लोकप्रियता अपने शिखर पर थी। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें दोहरे आजीवन कारावास की सजा दी। यद्यपि लोकमान्य तिलक उनके प्रशंसक थे, लेकिन जब स्वतंत्रता संग्राम की कमान कांग्रेस के हाथों में आई, तब सावरकर लगातार राजनीतिक षड्यंत्रों के शिकार होते गए।
सावरकर अखंड भारत के पक्षधर और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रबल प्रवक्ता थे। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान वे पंद्रह वर्षों से अधिक समय तक कठोर कारावास में रहे, जो अपने आप में एक दुर्लभ त्याग था। इसके बावजूद कांग्रेस ने उन पर अंग्रेजों से मिलीभगत के आरोप लगाए।
स्वतंत्रता के बाद भी सावरकर सरकारों के निशाने पर रहे। आज भारतीय जनता पार्टी जिस वैचारिक मंच पर खड़ी है, उसकी बुनियाद सावरकर के विचारों में देखी जा सकती है। उन्हें भले ही भारत रत्न न दिया गया हो, पर उनका व्यक्तित्व और योगदान इस प्रकार के सम्मान से कहीं ऊपर और व्यापक है।
सावरकर की हिंदू राष्ट्रवाद की अवधारणा आज भी गहन बौद्धिक चर्चा का विषय बनी हुई है। उनकी प्रसिद्ध कृति "हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है?", जिसे उन्होंने 1923 में रत्नागिरी जेल में लिखा, एक आदर्शवादी घोषणापत्र के रूप में सामने आई। यह पाठ हिन्दुत्व शब्द के प्रारंभिक उपयोगों में शामिल है और समकालीन हिन्दू राष्ट्रवाद के आधारग्रंथों में गिना जाता है।
यह पर्चा जेल से चोरी-छिपे बाहर निकाला गया और उनके समर्थकों द्वारा “महरत्ता” के छद्म नाम से प्रकाशित किया गया। सावरकर, जो स्वयं नास्तिक थे, हिन्दुत्व को धार्मिक से अधिक एक सांस्कृतिक, नस्लीय और राजनीतिक पहचान मानते थे। उनके अनुसार, हिन्दू वे हैं जो भारत को अपनी पितृभूमि और पुण्यभूमि मानते हैं।
उनका दृष्टिकोण पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को समेटते हुए अखंड भारत के विचार को प्रस्तुत करता है। उन्होंने लिखा:
“भारत में इतिहास की शुरुआत में ही बसे आर्य एक राष्ट्र का रूप ले चुके थे, जो अब हिन्दुओं में मूर्त है... हिन्दू एक दूसरे से केवल साझा मातृभूमि के प्रेम और समान रक्त के कारण नहीं बंधे हैं, बल्कि उस महान सभ्यता और संस्कृति की साझी श्रद्धा में भी बंधे हैं, जिसे हम 'हिंदू संस्कृति' कहते हैं।”
सावरकर के विचार आज भी भारतीय राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्श को गहराई से प्रभावित करते हैं।
भारतीय सेना में महिला शक्ति का दम दिखाई देने लगा है। पुरुषों की तरह महिलाएं भी सेना में बढ़ चढ़कर अपनी योग्यता का प्रदर्शन कर रही हैं। इसका ताजा उदाहरण हाल ही में सेना द्वारा चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर की प्रेस ब्रीफिंग में सेना की दो महिला अधिकारियों द्वारा युद्ध से संबंधित जानकारी देना एक महत्वपूर्ण कदम रहा है। विदेश सचिव विक्रम मिसरी के साथ कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर भारत के पराक्रम की तस्वीर को पूरी दुनिया के सामने पेश किया और बताया कि आखिर ऑपरेशन सिंदूर के जरिए भारत ने कैसे और क्या कार्रवाई की। सेना की दोनों महिला अधिकारियों ने सैनिक कार्रवाई की हर दिन प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से देश दुनिया को ताजा जानकारी प्रदान कर यह दिखा दिया कि भारत में महिला शक्ति भी किसी से कम नहीं है।
भारत में सदियों से महिलाओं को मातृशक्ति का दर्जा दिया जाता रहा है। कहा गया है कि यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः ।। अर्थातः जहां नारियों की पूजा होती है वहां देवता रमते हैं। जहां नारियों की पूजा नहीं होती, वहां किए गए सभी कार्य निष्फल हो जाते हैं। हम देश में साल में दो बार नवरात्र पर मातृशक्ति रूपी मा दुर्गा की पूजा कर देश दुनिया को यह संदेश देते हैं कि मातृ शक्ति भी किसी से कम नहीं है। अब तो हमारी सेना में पुरुषों से कंधे से कंधा मिलाकर महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर अपनी उत्कृष्ट क्षमता दिखा दी है। महिलाएं फाइटर प्लेन उड़ा रही हैं, वहीं युद्ध भूमि में हर प्रकार की भूमिका निभाने को तैयार नजर आ रही है।
भारतीय सशस्त्र बलों में महिलाओं की भागीदारी का इतिहास लंबे संघर्ष और बदलावों से भरा रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के समय से ही महिलाएं भारत की सुरक्षा और सेवा में अप्रत्यक्ष रूप से योगदान देती रही हैं। लेकिन सेना में औपचारिक तौर पर उनकी नियुक्ति का रास्ता बहुत बाद में खुला। साल 1943 में बनी रानी झांसी रेजिमेंट, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आजाद हिंद फौज का हिस्सा थी। यह पहली बार था जब महिलाएं युद्ध के मोर्चे पर सक्रिय रूप से दिखाई दीं। आजादी के बाद भी सशस्त्र बलों में महिलाओं को लंबे समय तक सहायक भूमिकाओं तक ही सीमित रखा गया।
भारत की तीनों सेनाओं (थल सेना, नौसेना, वायु सेना) में महिलाओं की संख्या को लेकर अगस्त 2023 में केंद्रीय रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने संसद में बताया था कि तीनों सेना में 11,414 महिलाएं सेवाएं दे रही हैं। थल सेवा में 7,054 महिलाएं सेवारत हैं। इनमें 1733 महिला अधिकारी हैं। यह आंकड़ा एक जनवरी 2023 तक का है। भारतीय वायु सेवा में 1,654 अधिकारी सेवारत हैं, जबकि 155 महिलाएं एयर मेन (अग्निवीर) के रूप में सेवा दे रही हैं। भारतीय नौसेना में 580 महिलाएं अधिकारी के रूप में सेवारत हैं, जबकि 727 महिलाएं सैलर्स (अग्निवीर) के तौर पर तैनात है।
इसी तरह 1,212 महिलाएं भारतीय थल सेना के आर्मी मेडिकल कॉर्प्स में, 168 महिलाएं आर्मी डेंटल कार्स में और 3841 महिलाएं मिलिट्री नर्सिंग सर्विस में कार्यरत है। 151 महिलाएं नौसेना के मेडिकल कॉर्प्स में, 10 महिलाएं डेंटल कार्य और 380 महिलाएं मिलिट्री नर्सिंग सर्विस में सेवारत हैं। 274 महिलाएं भारतीय वायु सेवा के मेडिकल कॉर्प्स में, पांच महिलाएं डेंटल कॉर्प्स में और 425 महिलाएं मिलिट्री नर्सिंग सर्विस में सेवारत हैं।
पहले महिलाओं को शार्ट सर्विस कमीशन में ही लिया जाता था। लेकिन फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद महिलाओं को सेना में स्थाई कमीशन मिलने लगा है। अब एनडीए की कुल सीटों का 10 प्रतिशत सीटों पर लड़कियां सिलेक्ट होती हैं और वह भी ओपन कंपटीशन में मुकाबला करके। रक्षा राज्य मंत्री संजय सेठ ने मार्च 2025 में संसद में बताया था कि 2022 में महिला कैडेट्स के पहले बैच की एंट्री के बाद से अब तक एनडीए में 126 महिलाओं को एडमिशन मिला है। आर्म्ड फोर्सज में आने के बाद उनके लिए भी अवसर समान होते हैं। उनका करियर प्रोग्रेस वैसा ही होगा जैसा लड़कों का होगा। सर्विस रूट समान होते हैं। अब हम गर्व के साथ कह सकते हैं कि हमारी सेना में पूरी तरह जेंडर न्यूट्रलाइजेशन हो गया है।
सेना में आज हमारी महिला कॉम्बैट पायलट भी हैं, जो मिसाइल चलती है और मोर्चे पर भी जाती हैं। वह इंजीनियरिंग का कार्य भी देखती हैं और सैटेलाइट को भी नियंत्रित करती हैं। अब महिलाएं डिफेंस भी करती हैं। टेक्निकल इंटेलिजेंस भी एकत्रित करती हैं। अभी तक आमने-सामने की लड़ाई में महिलाओं को नहीं भेजा जाता है। राजस्थान में झुंझुनू जिले की स्क्वाड्रन लीडर मोहन सिंह 2016 में भारतीय वायु सेवा की तेजस फाइटर स्पाइडर में शामिल होने वाली पहली महिला बनीं। इससे पहले वह मिग 21 बाइसन फाइटर प्लेन भी उड़ा चुकी हैं। ग्रुप कैप्टन सालिया धामी वायु सेवा की ऐसी पहली महिला अधिकारी बनी हैं, जो फ्रंटलाइन काम्पैक्ट यूनिट की कमान संभाल रही हैं। फ्लाइंग यूनिट की फ्लाइट कमांडर बनने वाली भी वह पहली महिला अधिकारी हैं। भारत की सशस्त्र सेना चिकित्सा सेवा और थलसेना एवं नौसेना की चिकित्सा सेवाओं का नेतृत्व महिला अधिकारी ही कर रही हैं।
रक्षा बलों में लैंगिक समानता सुनिश्चित करने की दिशा में भारत की प्रगति धीमी रही है। लेकिन लोगों का मानना है कि इसमें लगातार प्रगति हुई है। अब एक साथ बहुत सारी महिलाएं प्रमुख भूमिकाओं में हैं। वे दूसरों के लिए रास्ता बना रही हैं। उनके प्रदर्शन पर बहुत कुछ निर्भर करेगा। अगर वे अच्छा काम कर रही हैं तो उन्हें स्वीकार करना आसान होगा और आने वाली महिलाओं के लिए रास्ता साफ हो जाएगा।
शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत महिलाएं केवल 10 या 14 साल तक सेवाएं दे सकती हैं। इसके बाद वो सेवानिवृत्त हो जाती हैं। लेकिन अब उन्हें स्थायी कमीशन के लिए आवेदन करने का भी मौका मिलेगा। जिससे वो सेना में अपनी सेवाएं आगे भी जारी रख पाएंगी और रैंक के हिसाब से सेवानिवृत्त होंगी। साथ ही उन्हें पेंशन और सभी भत्ते भी मिलेंगे। 1992 में पांच साल के लिये शॉर्ट सर्विस कमीशन के लिए महिलाओं का पहला बैच भर्ती हुआ था। इसके बाद इस सर्विस की अवधि को 10 साल के लिए बढ़ाया गया। 2006 में शार्ट सर्विस कमीशन को 14 साल कर दिया गया।
भारतीय सेना अब महिलाओं को सशत्र बल में नियुक्ति के लिए उनके लिए तय की गई नीतियों को लागू कर प्रोत्साहित करती हैं। इसके लिए महिलाओं के लिए आर्मी मेडिकल कोर, आर्मी डेंटल कोर और मिलिटरी नर्सिंग सेवाओं के लिए परमानेंट कमिशन को मंजूरी दी गई है। अब 11 आर्म्स एंड सर्विसेज में महिला अधिकारियों को परमानेंट कमिशन मिलता है। जिनमें आर्मी सर्विस कोर, आर्मी आर्डनेंस कोर, आर्मी एडुकेशन कोर, जज एडवोकेट जनरल ब्रांच, इंजीनियर कोर, सिगनल कोर, इलेक्ट्रॉनिक्स और मकैनिकल कोर, इंटेलीजेंस कोर, आर्मी एयर डिफेंस, आर्मी एविएशन, रीमाउंट एंड वेटनरी कोर आदि शामिल हैं।
परमानेंट कमिशन के बाद महिला अधिकारी इंडियन आर्मी के सबसे महत्वपूर्ण अंगों में शामिल आर्टिलरी का हिस्सा बनने लगी हैं। सेना आर्टिलरी की लगभग 300 रेजिमेंट और लगभग 5,000 अधिकारी हैं। आर्टिलरी में शामिल महिला अधिकारियों की बोफोर्स, होवित्जर, के-9 वज्र जैसी तोपों पर भी 2023 में तैनाती की अनुमति दी जा चुकी है।
वर्तमान में भारतीय सशस्त्र बलों में नियुक्तियों में लैंगिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। पुरुष और महिला जवानों की हथियारों और सेवाओं के लिए तैनाती में किसी प्रकार का अंतर नहीं किया जाता है। सभी की पोस्टिंग सेना की जरूरतों के अनुसार की जाती है। भारतीय सेना में महिला अफसरों को परमानेंट कमिशन के लिए 23 नवंबर 2021 को एक जेंडर न्यूट्रल करियर प्रोग्रेशन पॉलिसी लाई गई थी। इसके जरिए महिलाओं को हथियारों व अन्य सेवाओं में समान अवसर उपलब्ध कराए गए हैं।
(लेखक - -रमेश सर्राफ धमोरा, हिन्दुस्थान समाचार से संबद्ध हैं।)
साहित्य सिर्फ कोरी कल्पना या फंतासी नहीं। साहित्य जीवन का यथार्थ है और हर स्वांस में रचा बसा है। कन्नड़ लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता अधिवक्ता बानू मुश्ताक की अंग्रेजी में अनूदित कृति हॉर्ट लैम्प को बुकर पुरस्कार से नवाजा गया है। यह भारतीय भाषायी साहित्य के लिए बेहद गर्व और गौरव का विषय है। इससे यह साबित होता है कि लेखन किसी धर्म, भाषा, जाति और सीमा में बंधा नहीं है। आम तौर पर सर्वहारा वर्ग की पीड़ा एक जैसी होती हैं, उनकी जाति या धर्म कुछ भी हो। यह पुरस्कार भारतीय भाषाओं के लिए एक संजीवनी है। बुकर पुरस्कार भाषा के नाम पर लड़ने वाले एक सभ्य समाज के लिए साफ संदेश है। अगर भाषा का विभेद होता तो दीपा भस्थी की तरफ से कन्नड़ से अनूदित बानू मुश्ताक की सिर्फ 12 लघुकथाओं के संकलन हॉर्ट लैम्प को बुकर पुरस्कार से सम्मानित नहीं किया जाता। भाषा और साहित्य सीमा से बहुत दूर है। अब तक यह अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार छह भारतीय लेखकों को मिल चुका है। इसके लिए बानू मुश्ताक के साथ दीपा भी बधाई की पात्र हैं, क्योंकि यह उनकी पहली अनूदित कृति है जिसे यह सम्मान मिला है।
बानू मुश्ताक दक्षिण भारतीय लेखिका हैं। बानू मूलरूप से कन्नड़ में अपना लेखन करती हैं। बानू को जो बुकर पुरस्कार मिला है वह कन्नड़ में लिखी उनकी लघुकथा संग्रह से चुनी कुछ लघुकथाओं के अंग्रेजी अनुवाद पर दिया गया है। उन्होंने कुल छह लघुकथा संग्रह, एक उपन्यास, एक निबंध और एक कविता संग्रह लिखा है। उनकी रचनाओं का अनुवाद हिंदी, तमिल, मलयालम और उर्दू में किया गया है। उन्हें इसके अलावा और भी पुरस्कार मिले हैं। साहित्य में सबसे अहम सवाल है कि आप कितना लिख रहे हैं यह मायने नहीं रखता है। वजूद इस बात का है कि आप क्या लिख रहे हैं। लिखा तो बहुत कुछ जा रहा है या बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन सबको बुकर नहीं मिला। बुकर को ध्यान में रखकर लिखना भी संभव नहीं है, क्योंकि साहित्य कोई तकनीक नहीं एक जीवंत कला है जो बगैर जीवन के जीवंत नहीं होती। बानू लंकेश पत्रिका से भी जुड़ी थीं और उन्होंने बेंगलुरु में ऑल इंडिया रेडियो में भी काम किया।
बानू मुश्ताक (77) की स्कूली शिक्षा की शुरुआत भी कठिन चुनौतियों से हुई यही उनके लेखकीय जीवन की चुनौती बनी। उनका जन्म 1948 में कर्नाटक के मुस्लिम परिवार में हुआ था। शिवमोगा के कन्नड़ मिशनरी स्कूल में पिता के काफी प्रयास के बाद उनका दाखिला भी आठ साल की उम्र में इस शर्त पर हुआ था कि उन्हें छह माह में कन्नड़ को लिखना-पढ़ना आना चाहिए, नहीं तो स्कूल छोड़ना पड़ेगा। बानू एक मुस्लिम परिवार से रहीं जहां स्कूल की शर्त उनके लिए एक चुनौती थी, लेकिन उन्होंने कर दिखाया। मुश्ताक ने 1980 में मुस्लिम समाज में कट्टरता को कम करने के लिए काम किया। उन्होंने मस्जिदों में भी मुस्लिम महिलाओं के प्रवेश की वकालत किया जिसकी वजह से उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार भी हुआ। उन्हें जान से मारने की धमकियां भी मिलीं। हालांकि उन्होंने स्कूलों में मुस्लिम लड़कियों के हिजाब पहनने का समर्थन किया था, जिसका विवाद कर्नाटक के शिक्षा संस्थानों में आज भी मुद्दा है।
बानू मुश्ताक ने मुस्लिम समाज में औरतों और दूसरी समस्याओं को बड़ी गहराई से परखा। ऐसी समस्याओं ने उन्हें प्रभावित किया जिसे उन्होंने कहानी या लघुकथा का आधार बनाया। लिखने का शौक उन्हें बचपन से था, उनकी पहली कहानी 26 साल की उम्र में प्रजामाता में प्रकाशित हुई। इसके बाद लेखन की दुनिया में उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। जिस हॉर्ट लैम्प के लिए उन्हें अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिला है उसमें 1990 से 2023 तक की लघुकथाएं हैं। इनमें मुस्लिम समाज की महिलाओं का संघर्ष दिखाया गया है। अनुवादक दीपा भस्थी भी पहली भारतीय हैं जिन्हें यह सम्मान मिला है।
मुश्ताक की कहानियों का अनुवाद साल 2022 में पहली बार दीपा भस्थी ने अंग्रेजी में किया। इसमें उन्होंने हॉर्ट लैंप नाम से कन्नड़ से कुछ चुनी हुई कहानियों का अंग्रेजी में अनुवाद किया, जिन्हें बुकर पुरस्कार 2025 से सम्मानित किया गया है। इस पुरस्कार में 50 हजार पाउंड की राशि लेखक को मिलती है। इसमें आधी राशि अंग्रेजी अनुवादक के हिस्से में जाती है। खास यह है कि बुकर पुरस्कार सिर्फ अंग्रेजी कृति या उस भाषा में अनूदित संग्रह को ही मिलता है। इसका मकसद साफ है कि अच्छा साहित्य सभी तक पहुंचना चाहिए, क्योंकि कि साहित्य की कोई सीमा नहीं होती है। भारतीय रुपये में इस पुरस्कार की कीमत 52.95 लाख होती है। मुश्ताक पहली कन्नड़ लेखिका हैं, जिन्हें बुकर पुरस्कार 2025 के लिए चुना गया। यह अनुवादक दीपा भस्थी के लिए भी गर्व का विषय है।
बुकर पुरस्कार के निर्णायक मंडल के अध्यक्ष मैक्स पोर्टर ने कहानियों की सराहना की है। उन्होंने कहा है कि हालांकि मुश्ताक की कहानियां स्त्रीवादी विचारधारा की पोषक हैं। पितृसतात्मक व्यवस्था का मुखर विरोध और प्रतिरोध है। लेकिन सबसे अहम बात है कि इसमें स्त्री के दैनिक जीवन के संघर्ष को बेहद उम्दा तरीके से प्रदर्शित किया गया है। यह अपने आपमें सबसे अलग है।
अब तक छह पूर्व भारतीय लेखकों को उनकी कृति के लिए अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिल चुका है। इनमें वीएस नायपॉल, सलमान रुश्दी, अरुंधती राय, किरण देशाई, अरविंद अडिगा और गीतांजली श्री को हिंदी उपन्यास के लिए 2022 में यह पुरस्कार मिला था। जबकि सबसे पहले 1971 में नायपॉल को मिला मिला था। बुकर की होड़ में पांच किताबें शामिल थीं जिसमें सोलेज की ऑन द कलकुलेशन ऑफ वैल्यूज, स्मॉल बोट की विसेंट डेलिक्रोइस्क, हीरोमी कावाकामी की अंडर द आई ऑफ द बिग बर्ड, डिसेंजो लैट्रिनिको की परफेक्शन और ऐरी सेरे की ए लैपर्ड स्किन हैट हैं। ऐसी स्थित में कन्नड़ से अंग्रेजी में अनूदित हॉर्ट लैम्प को बुकर मिलना गर्व की बात है।
बुकर पुरस्कार की स्थापना 1969 में इंग्लैंड की मैकोनल कम्पनी ने की थी। इस पुरस्कार का पूरा नाम मैन बुकर प्राइज फॉर फिक्शन है। इसमें लेखक और अनुवादक को निर्धारित 50 हजार पाउंड की राशि में आधा-आधा हिस्सा मिलता है। इस पुरस्कार का उदेश्य अच्छे साहित्य का विकास है। इसकी अवधारणा है कि किसी भी अच्छे साहित्य की कोई सीमा नहीं होती, बस उसके लिए मंच और माध्यम आवश्यक है। इसमें न लेखक की भाषा मायने रखती है न लेखक की जाति और धर्म। बस ! आप भी लिखते हैं तो कुछ अच्छा लिखिए, भले छोटा लिखिए या कम लिखिए।
(लेखक- प्रभुनाथ शुक्ल, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
अस्पृष्यता एक पाप है, मानवता पर एक धब्बा है और कोई भी इसे उचित नहीं ठहरा सकता । यह प्रसिद्ध पंक्ति विनायक दामोदर सावरकर की थी। वे एक स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ, समाज सुधारक, वकील और हिन्दुत्व के दर्शन के सूत्रधार थे। सावरकर भारत के पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के केन्द्र लंदन में ही उसके खिलाफ क्रांतिकारी आन्दोलन संगठित किया था। उन्होंने 1857 की क्रांति को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम बताते हुए 1907 में लगभग 1000 पृष्ठों का इतिहास लिख डाला। उन्होंने पुस्तक ‘ द हिस्ट्री ऑफ द वॉर ऑफ इंडिपेंडेस’ लिखी थी, जिसको अंग्रेजों ने जब्त कर लिया था। कारण था कि उन्होंने ब्रिटिश सरकार की नीतियों का वर्णन किया था।
उनका जन्म 28 मई, 1883 को महाराष्ट्र के नासिक के पास एक छोटे से गांव भंगूर में हुआ। वे अपने बड़े भाई गणेश सावरकर के साथ मिलकर 1904 में ‘अभिनव भारत’ नामक संस्था का निर्माण किया। सावरकर ने पुणे के फर्ग्यूसन कॉलेज में एक छात्र के रूप में अपनी राजनीतिक भागीदारी जारी रखी। वे कट्टरपंथी राष्ट्रवादी नेता लोकमान्य तिलक से बहुत प्रभावित थे। तिलक भी इस युवा छात्र से इतने प्रभावित थे कि उन्हें लंदन में कानून की पढ़ाई के लिए 1906 में शिवाजी छात्रवृत्ति दिलाने में सहायता की। 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में दशहरे के दिन सावरकर ने विदेशी वस्तुओं की होली जलाकर स्वदेशी आन्दोलन की अलख जगाई। उन्होंने स्वतंत्रता के लिए बहुत संघर्ष किया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाई। सावरकर ने भारत को एक मजबूत और एकजुट राष्ट्र बनाने की अवधारणा दी , जिसे हिन्दुत्व की संज्ञा देने से भी पीछे नहीं हटे।
उन्हाेंने ‘ अखण्ड भारत ’ की अवधारणा को भी आगे बढ़ाया, जो भारत को एक साथ रखने और एकीकरण की बात करती है। उन्होंने राष्ट्रवादी विचारों को बढ़ावा देने के लिए अपनी किशोरावस्था में ही ‘मित्र मेला’ युवा संगठन की स्थापना की थी , इसके माध्यम से अनेक उत्साही युवाओं को जोड़ने का काम किया था। मदनलाल धींगरा और लक्ष्मण कन्हरे जैसे क्रांतिकारियों के प्रेरणा स्रोत बने, जिन्होंने विलियम कर्जन वाइली और नासिक के जिला कलेक्टर की हत्या कर भारतीयों को उनके जुल्म से आजादी दिलाई थी। लंदन में श्यामला कृष्ण वर्मा के इंडिया हाउस को उन्होंने क्रांतिकारियों के ट्रैनिंग सेंटर में तब्दील कर दिया था। 13 मार्च, 1910 को उन्हें लंदन से गिरफ्तार किया गया । उन पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने हथियारों की खरीद और वितरण किया।
ब्रिटिश राज के खिलाफ युद्ध छेड़ने और देशद्रोही भाषण दिए। गिरफ्तारी के समय वे कई क्रांतिकारी ग्रंथ साथ ले जा रहे थे। जिनमें उनकी प्रतिबंधित पुस्तकें भी शामिल थीं। ब्रिटिश सरकार के पास इस बात के सबूत थे कि उन्होंने भारत में 20 ब्राउनिंग हैंडगन की तस्करी की थी, जिनमें से एक का इस्तेमाल अनंत लक्ष्मण कन्हेरे ने दिसम्बर, 1909 में नासिक जिले के कलेक्टर जैक्सन की हत्या करने में किया था।
गिरफ्तारी के बाद वे फ्रांस के मर्सेल्स में जहाज से समु्रद में कूद कर भाग निकले थे। इसके बाद फिर अंग्रेज सरकार ने उनको गिरफ्तार कर लिया। 7 अप्रेल, 1911 में उन्हें कुख्यात अंडमान और निकोबार द्वीप जेल ( जिसे कालापानी के नाम से भी जाना जाता है ) में दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई । उन्होंने जेल में ही 1922 में ‘इसेंशियल ऑफ हिन्दुत्व’ नामक पुस्तक की रचना की। आज इसे आधुनिक हिंदुत्व का एक प्रमुख आधार माना जाता है। वे 1924 में जेल से रिहा होने के बाद शेष जीवन हिन्दू समाज को संगठित करने, महिलाओं के जीवन का उत्थान करने, अस्पृष्यता मिटाने में खपा दिया। वे हिन्दुत्व को किसी जाति और कर्मकांड में बांधने का विरोध जताते थे। उनका मानना था कि हिन्दू धर्म एक जातीय, सांस्कृतिक और राजनीतिक पहचान है। हिन्दू वे हैं, जो भारत को अपनी भूमि मानते हैं, जिसमें उनके पूर्वज रहते थे। साथ ही वह भूमि जिसे वे षुद्ध या पुण्यभूमि मानते हैं वह जिसके लिए भारत पितभूमि और पवित्र भूमि दोनों हैं।
उन्होंने अस्पृष्यता के खिलाफ एक शक्तिशाली
अभियान चलाया और रत्नागिरी जिले में पतित पावन मंदिर का निर्माण कराया। इसमें दलित समुदाय के लोगों सहित सभी हिन्दुओं का स्वागत किया गया। वे तर्कसगंत से पारंपरिक आडम्बरों का विरोध जताया। जाति व्यवस्था का विरोध जताते हुए 1931 में ‘हिन्दू समाज की सात बेडियां’ शीर्षक लिखे अपने निबंध में वे बताते हैं कि अतीत के ऐसे आदर्शों का सबसे महत्वपूर्ण घटक जिसे हम आंख मूंदकर मानते आए हैं और जो इतिहास के कूदेदान में फेंक दिए जाने योग्य हैं, वह है कठोर जाति व्यवस्था।
स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर जब अंडमान निकोबार द्वीप की जेल में थे, उनके पास लिखने के लिए कोई कागज और पेन नहीं था। ब्रिटिश सरकार ने उनके लिए कोई कागज उपलब्ध नहीं कराया। इसके बाद भी सावरकर ने हार नहीं मानी। उन्होंने देखा कि जेल की दीवारें सफेद रंग से पुती हुई हैं, उनके पास सन के कांटे और एक लोहे की कील थी। आजादी के मतवाले कहां रुकने वाले थे, उन्होंने दीवार पर कील और कांटे से अपने विचारों को दीवार पर लिखने लगे। जेल की एक-एक दीवार एक-एक ग्रंथ बन गई। उन्होंने स्पेंसर की अज्ञेय मीमांसा को युक्तिवाद क्रम से अंकित किया। कमला महाकाव्य की रचना उन्हीं दीवारों पर अंकित की।
एक दीवार पर उन्होंने अर्थशास्त्र की महत्वपूर्ण परिभाषाएं लिखीं। हर माह कैदियों के कमरे बदले जाते थे। उनका मुख्य लक्ष्य यह था कि हर बार हर कमरे में महत्वपूर्ण विचार लिखे जाएं। उनके पढ़ने का सभी कैदियों को मौका मिले। कैदियों को नई-नई जानकारियां मिलती रहे। इन लेखों की उम्र एक साल होती थी। हर साल उनको दीवारों से पुताई करवाकर मिटा दिया जाता था। लेकिन सावरकर ने वे विचार कंठस्थ याद कर लिए थे। बहरहाल, यही कहा जा सकता है कि वीर सावरकर को वह सम्मान नहीं मिला, जो एक स्वतंत्रता सेनानी को मिलना चाहिए था। उनके देहांत पर महाराष्ट्र सरकार और केन्द्र सरकार ने शोक दिवस घोषित नहीं किया। लेकिन अब सरकार उनके किए गए स्वतंत्रता आन्दोलन को सामने लाने का प्रयास कर रही है।
लेखक - डॉ.लोकेश कुमार( स्वतंत्र पत्रकार हैं)
27 मई: साहित्य के सूर्य डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी की जयंती पर विशेष
हिंदी साहित्य जगत की एक अमिट विभूति, डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, जिनका जन्म 27 मई को हुआ था, को आज उनके अद्वितीय साहित्यिक योगदान के लिए सादर नमन। उन्होंने न केवल छत्तीसगढ़ को, बल्कि संपूर्ण हिंदी साहित्य को अपनी विद्वता, लेखनी और साहित्यिक पत्रकारिता से गौरवान्वित किया। लगभग छह दशकों तक साहित्य सेवा में निरंतर सक्रिय रहे बख्शी जी का साहित्यिक प्रकाश आज भी हिंदी साहित्य को आलोकित करता है।
डॉ. बख्शी का जन्म 1894 में तत्कालीन मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ़) की खैरागढ़ रियासत में हुआ था, जो आज एशिया के पहले संगीत विश्वविद्यालय के लिए प्रसिद्ध है। उनके पिता पुन्नालाल बख्शी खैरागढ़ के एक प्रतिष्ठित व्यक्ति थे और माता मनोरमा देवी साहित्यप्रेमी थीं। पारिवारिक वातावरण में साहित्यिक रुचि विकसित हुई और उन्होंने शिक्षा खैरागढ़ तथा जबलपुर में प्राप्त की। 1916 में बी.ए. की उपाधि हासिल की। वे आगे एलएलबी करना चाहते थे, लेकिन साहित्य के प्रति समर्पण के कारण यह सपना अधूरा रह गया।
किशोरावस्था से ही उन्होंने लेखन की शुरुआत की। उनकी पहली कहानी ‘तारिणी’ 1911 में जबलपुर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘हितकारिणी’ में छपी। प्रारंभ में कविताएँ लिखीं और ‘शतदल’ नामक काव्य संग्रह के माध्यम से अपनी सृजनशीलता का परिचय दिया। हालांकि आगे चलकर वे एक सशक्त निबंधकार, आलोचक, संपादक और शिक्षक के रूप में प्रसिद्ध हुए।
1916 से 1919 तक वे राजनांदगांव में संस्कृत शिक्षक रहे और फिर 1929 से 1949 तक खैरागढ़ विक्टोरिया हाई स्कूल में अंग्रेजी पढ़ाते रहे। साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। वे 1920 में ‘सरस्वती’ पत्रिका के सहायक संपादक और 1921 में प्रधान संपादक बने। साथ ही, ‘छाया’ (इलाहाबाद) पत्रिका के भी संपादक रहे।
डॉ. बख्शी ने निबंध, आलोचना, उपन्यास, कहानी, यात्रा-वृत्तांत और कविता – सभी विधाओं में महत्वपूर्ण लेखन किया। उनके निबंधों में संवाद की सहजता और कहानी जैसी रोचकता पाई जाती है। उनकी प्रमुख आलोचनात्मक कृतियों में ‘हिंदी साहित्य विमर्श’, ‘विश्व साहित्य’, ‘हिंदी कहानी साहित्य’ और ‘हिंदी उपन्यास साहित्य’ प्रमुख हैं।
उनके चर्चित निबंध संग्रहों में ‘पंचपात्र’, ‘कुछ और कुछ’, ‘बिखरे पन्ने’, ‘तुम्हारे लिए’, ‘हम – मेरी अपनी कथा’, ‘मेरे प्रिय निबंध’, ‘समस्या और समाधान’ तथा ‘हिंदी साहित्य: एक ऐतिहासिक समीक्षा’ शामिल हैं। ‘यात्री’ नामक यात्रा-वृत्तांत में उन्होंने जीवन को ‘अनंत पथ की यात्रा’ के रूप में प्रस्तुत किया है।
काव्य संग्रहों में ‘शतदल’ और ‘अश्रुदल’ तथा कहानी संग्रहों में ‘झलमला’ और ‘अंजलि’ उल्लेखनीय हैं।
उनके योगदान को सम्मानित करते हुए 1949 में हिंदी साहित्य सम्मेलन ने उन्हें ‘साहित्य वाचस्पति’ की उपाधि दी। 1950 में वे मध्यप्रदेश हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति चुने गए और 1969 में उन्हें मध्यप्रदेश सरकार द्वारा डी.लिट् की उपाधि प्रदान की गई।
28 दिसंबर 1971 को रायपुर के डी.के. अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली, लेकिन उनका रचा हुआ साहित्य आज भी हिंदी जगत में प्रेरणा का स्रोत है।
डॉ. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी न केवल छत्तीसगढ़ बल्कि समूचे हिंदी साहित्य के एक प्रकाशस्तंभ थे। उनकी लेखनी ने पाठकों को चिंतन, रस, सौंदर्य और विवेक से परिचित कराया। इस अवसर पर, उनके निष्काम साहित्यिक समर्पण और गहन दृष्टिकोण को स्मरण करते हुए, उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है।
हिंदी साहित्य के इस ऋषितुल्य साधक को शत्-शत् नमन।
बाजीराव पेशवा की मरहठी सेना ने निजाम की फौज को चारों ओर से घेर लिया। उसके रसद तथा हथियार मिलने के जो रास्ते थे, वे सारे बन्द हो गये। इन्हीं दिनों मुहर्रम का त्यौहार आ गया, मगर घेरे में पड़े निजाम के शिविर में भूखों मरने की नौबत आ गयी थी। विवश हो निजाम ने पेशवा को पत्र लिखा - "क्या हमारे सिपाहियों को त्यौहार के दिनों में भी भूखों मरना पड़ेगा? हमने तो सुना था कि पेशवा बहादुर होने के साथ ही रहमदिल होते हैं और वे भूखे दुश्मन पर वार नहीं करते ?"
पेशवा ने निजाम का पत्र अपने अष्टप्रधानों के सामने रखा। वे सभी एक स्वर में बोले, "निजाम पर दया करना ठीक नहीं।" किन्तु पेशवा ने कहा, "मरहठे वीर हैं, पर साथ ही मनुष्य भी हैं। वीरता का यह तकाजा है कि शत्रु को अवश्य पराजित किया जाये, पर मानवता की यह अपेक्षा होती है कि क्षुधित शत्रु को भी भोजन दिया जाये।" और पेशवा की आज्ञा से निजाम के पास रसद की गाड़ियाँ भेज दी गयीं।
होन्गासान्द्रा वेंकेटरमैया शेषाद्री: समर्पित प्रचारक, लेखक और राष्ट्रसेवक
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के साहित्यिक और संगठनात्मक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले वरिष्ठ प्रचारक होन्गासान्द्रा वेंकेटरमैया शेषाद्री का जन्म 26 मई 1926 को बैंगलोर में हुआ। उन्होंने 1940 में मैसूर विश्वविद्यालय से रसायन विज्ञान में स्वर्ण पदक के साथ एमएससी किया और 1943 में स्वयंसेवक बनकर संघ कार्य से जुड़ गए।
शेषाद्री जी ने प्रारंभिक कार्य बैंगलोर और कर्नाटक में किया, फिर दक्षिण भारत के विविध क्षेत्रों में सक्रिय रहे। 1987 से 2000 तक वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह रहे और इस दौरान भारत सहित विश्व के अनेक देशों में संघ कार्य का विस्तार किया। यादव कृष्ण जोशी से प्रभावित होकर उन्होंने राष्ट्रीय उत्थान परिषद की स्थापना की, जो संघ व हिंदू विचारधारा से संबंधित साहित्य के प्रकाशन में अहम भूमिका निभाती रही।
उन्होंने ‘विक्रम’, ‘उत्थान’, ‘ऑर्गनाइज़र’, ‘पाञ्चजन्य’ और ‘राष्ट्रीय धर्म मासिक’ में नियमित लेखन किया। पाठक उनके लेखों की प्रतीक्षा किया करते थे। उनकी 100 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुईं। विशेष रूप से उन्होंने संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के व्यक्तित्व को साहित्य के माध्यम से जनसामान्य के सामने प्रस्तुत किया।
उनकी पुस्तक "The Tragic Story of Partition" को सीताराम गोयल और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भी सराहा। उन्होंने संस्कृत के प्रचार, सेवाकार्य के विस्तार और राष्ट्रीय विचारधारा के प्रसार में अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित किया। उनका निधन 2005 में हुआ, और उनके अंतिम संस्कार में हजारों लोग शामिल हुए।
माना जाता है कि त्रियुगीनारायण मंदिर त्रेतायुग से स्थापित है। इस मंदिर में आज भी अग्निकुंड में अग्नि जलती है यहां प्रसाद के रूप में लकड़ियां डाली जाती है इस अग्निकुंड में श्रद्धालु धूनी भी लेकर जाते है ताकि उनके वैवाहिक जीवन मे सदा सुख-शांति बनी रहे।
त्रियुगीनारायण मंदिर को त्रिवुगीनारायण मंदिर से भी जाना जाता है। यह मंदिर अत्यंत प्राचीन हिन्दू मंदिर है जो कि उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले के त्रियुगीनारायण गांव में स्थित है। भगवान विष्णु इस मंदिर में माता लक्ष्मी व भूदेवी के साथ विराजमान है।
त्रियुगीनारायण मंदिर का इतिहास
माता पार्वती ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को विवाह हेतु प्रसन्न किया और भगवान शिव ने माता पार्वती के प्रस्ताव को स्वीकार किया। माना जाता है शिव-पार्वती का विवाह इसी मंदिर में सम्पन्न हुआ था। भगवान विष्णु ने माता पार्वती के भ्राता होने का कर्तव्य निभाते हुए उनका विवाह संपन्न करवाया। ब्रह्मा जी इस विवाह में पुरोहित थे। इस मंदिर के सामने अग्निकुंड के ही फेरे लेकर शिव-पार्वती का विवाह हुआ था। उस अग्निकुंड में आज भी लौ जलती रहती है। यह लौ शिव-पार्वती विवाह की प्रतीक मानी जाती है, इसलिए इस मंदिर को अखंड धूनी मंदिर भी कहा जाता है। मंदिर के पास ही तीन कुण्ड भी है।
ब्रह्माकुण्ड:- इस कुण्ड में ब्रह्मा जी ने विवाह से पूर्व स्नान किया था व स्नान करने के पश्चात विवाह में प्रस्तुत हुए।
विष्णुकुण्ड:- विवाह से पूर्व विष्णु जी ने इस कुण्ड में स्नान किया था।
रुद्रकुण्ड:- विवाह में उपस्थित होने वाले सभी देवी-देवताओं ने इस कुण्ड में स्नान किया था।
इन सभी कुण्डों में जल का स्रोत सरस्वती कुण्ड को कहा गया है। सरस्वती कुण्ड का निर्माण विष्णु जी की नासिका से हुआ है। माना जाता है कि विवाह के समय भगवान शिव को एक गाय भी भेंट की गई थी, उस गाय को मंदिर में ही एक स्तम्भ पर बांधा गया था।
त्रियुगीनारायण मंदिर की मान्यतायें
विवाह से पहले सभी देवी-देवताओं ने जिस कुण्ड में स्नान किया था, उन सभी कुण्डों में स्थान करने से "संतानहीनता" से मुक्ति मिलती है व मनुष्य को संतान की प्राप्ति होती है।
पौराणिक कथा के अनुसार राजा बलि ने इन्द्रासन पाने की इच्छा से सौ यज्ञ करने का निश्चय किया और निन्यानबे यज्ञ होने के पश्चात भगवान विष्णु वामन अवतार धारण करके राजा बलि का अंतिम यज्ञ भंग कर दिया, तब से इस स्थान पर भगवान विष्णु की वामन देवता अवतार में पूजा-अर्चना की जाती है।
मंदिर में कुल चार कुंड स्थित हैं जो देवों द्वारा निर्मित हैं। यहाँ से गुज़रने वाला जल स्त्रोत इन कुंडों में जल की आपूर्ति करता है। मंदिर के प्रांगण में जाते ही सबसे पहले ब्रह्म कुंड दिखाई पड़ता है जहा श्रद्धालु स्नान किया करते हैं। ब्रह्म कुंड के समीप ही रुद्र कुंड स्थित है, यह भी भक्तों के स्नान हेतु निर्मित किया गया था। रुद्र कुंड से आगे बढ़ने पर विष्णु कुंड के दर्शन होते हैं, इस कुंड के जल से आंतरिक शुद्धि के लिए आचमन किया जाता है।
विष्णु कुंड के बिल्कुल बगल में नारद कुंड है जहाँ जौ के आटे के पिंड बनाकर पिंड दान किया जाता है। सबसे ऊपर की ओर स्थित है सरस्वती कुंड जहाँ जौ और तिल के द्वारा पित्र तर्पण किया जाता है। मंदिर के प्रांगण में है महालक्ष्य यज्ञ कुंड जिसका मुख एक पत्थर से ढँका रहता है जो सिर्फ़ यज्ञ के समय की खोला जाता है।
महालक्ष्य यज्ञ कुंड में महायज्ञ होता है जो 108 ब्राह्मणों के द्वारा किया जाने वाला 18 दिनों का यज्ञ है। यह यज्ञ विशेष तिथि और अर्ध शताब्दी के अंतराल में होता है। यह सभी कुंड मंदिर के बाहरी कुंड हैं। मंदिर के भीतर दो और गुप्त कुंड है जिन्हें अमृत कुंड और सूरज कुंड। अमृत कुंड के जल से भगवान को स्नान कराया जाता है और सूरज कुंड के जल से भगवान के लिए भोग तैयार किया जाता है।
मंदिर में प्रवेश करते ही अखंड धूनी के दर्शन होते हैं जिसकी अग्नि ऋषिमुनियों के मन्त्रों द्वारा गौरी-शंकर के विवाह के समय प्रज्वलित की गई थी। इसमें नित्य ही यज्ञ किया जाता है तथा ग्राम वासियों द्वारा निरंतर इस अग्नि को प्रज्वलित रखा जाता है। इस यज्ञ की विभूति की यहाँ का मुख्य प्रसाद माना जाता है।
इस धूनी को प्रज्वलित रखने के लिए गाँव के एक परिवार की ज़िम्मेदारी तीन दिनों तक रहती है। मंदिर के सामने वाले प्रांगण में पंचनाम देवता हैं। मंदिर के मुख्य द्वार पर श्री गणेश तथा मछंदनाथ जी की मूर्तियाँ हैं। मछंदनाथ मंदिर के वीर तथा भगवान गणेश मंदिर के रखवाले माने जाते हैं।
यहाँ माँ अन्नपूर्णा का भी मंदिर है, जिन्हें पार्वती का ही स्वरूप माना जाता है। इसके सिवा यहाँ ईशानेश्वर भगवान का मंदिर भी है। अखंड धूनी मंदिर की स्थापना के समय ईशान कोण में रुद्र देवी की स्थापना की गई थी जिसके कारण इसका नाम ईशानेश्वर महादेव मंदिर पड़ा। इसी प्रांगण में स्थित है अर्धनारीश्वर मंदिर।
अन्नपूर्णा माँ के मंदिर के ऊपर ही हनुमान जी का मंदिर भी है जिसकी बायीं ओर है धूनीसागर। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव का लिंग भस्मी के अंदर है। मंदिर की दूसरी तरफ है धर्मशिला जहाँ तीर्थ पूजन किया जाता है। यदि कोई इस मंदिर में विवाह करता है तो इसी धर्मशिला पर कन्यादान किया जाता है। यही राजा हिमवत ने अपनी पुत्री पार्वती का कन्यादान किया था। पास ही गौ दान करने के लिए गौ बाँधने की खूँटी भी है।
जब शिव-पार्वती का विवाह हुआ था तब इसी खूँटी पर राजा हिमवत ने अपनी पुत्री को सवा सौ लाख गायों का दान किया था। जब कोई भी इस मंदिर में विवाह करता है तो विवाह मंडप यही धर्मशिला पर सजाया जाता है और सप्त फेरे मंदिर के भीतर अखंड धूनी को साक्षी मान कर लिए जाते हैं। मंदिर के अंदर शिव-पार्वती की युगल मूर्ति है जो पत्थर पर उकेरी गई है और प्राचीन काल से यही स्थापित है।
पास ही एक और मूर्ति दिखाई पड़ती है जिसमें भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी शेषनाग पर विराजमान हैं। मंदिर परिसर में ही भोग मंडी है जहाँ भगवान का भोग तैयार किया जाता है। भोग तैयार करने की ज़िम्मेदारी भी ग्राम के प्रत्येक परिवार की होती है। एक परिवार तीन दिनों के लिए भोग बनाने का उत्तरदायित्व निभाता है, तीन दिनों के पश्चात यह ज़िम्मेदारी दूसरे परिवार को दे दी जाती है। भगवान विष्णु का वाहन गरुड़ होने के कारण मंदिर के ऊपर गरुड़ ध्वज है।
मुख्य मंदिर के भीतर बीच में श्री त्रियुगीनारायण जी की मूर्ति है जिसके दाहिनी ओर में माता लक्ष्मी और बायीं ओर माता सरस्वती और पीछे क्षेत्रपाल, कुबेर, मछंदनाथ, बद्रीनारायण, रामचन्द्र, सत्यनारायण, बड़ी चतुर्भुज मूर्ति, और भगवान विष्णु का अखंड दीपक है। चाहे आप भारत के किसी भी राज्य से हैं, अगर आपने पूर्वज यहाँ आए होंगे तो बहीखातों के द्वारा आपको उनकी पूरी जानकारी यहाँ मिल जायेगी।
बुद्ध का दुख विश्लेषण विश्वदर्शन में श्रेष्ठतम है। अभिभूत करने वाला है। इसकी अंतिम कड़ी है 'अविद्या'। अविद्या का मतलब मूर्खता नहीं है। सृष्टि-जगत को सार रूप में न जानना ही 'अविद्या' है। भारतीय दर्शन की सभी शीर्ष धाराओं में दुख का मूल कारण 'अविद्या' है। यह बुद्ध दर्शन में भी है। उपनिषद् साहित्य विद्या और अविद्या के विवेचन से से भरा पूरा है। ईशावास्योपनिषद् के नवें, दसवें व ग्यारहवें मंत्रों श्लोकों का विषय 'विद्या और अविद्या' है। कहते हैं, ''अविद्या के उपासक अंधतम लोक में प्रवेश करते हैं। इसी तरह विद्या के उपासक भी अंधेरे में हैं। धीर पुरुषो से सुना है कि विद्या और अविद्या के फल अलग-अलग हैं। जो दोनो को एक साथ जानते है वे अविद्या से संसार-मृत्यु को पार करते हैं और विद्या से अमृत पाते हैं।'' मधुमय जीवन के लिए दोनो का बोध जरूरी है। विद्या मुक्त करती है, अविद्या यानी संसार का ज्ञान संसार को मधुमय प्रीतिमय बनाता है।
ऋग्वेद में दोनो हैं। ऋग्वेद के समाज में परम सत्ता की खोज और खेती किसानी साथ-साथ चलती है। परमतत्व की लब्धि चाहिए, लेकिन संसार मायाजाल नहीं है। न अकेली विद्या ठीक, न अकेली अविद्या। शुक्ल पक्ष का आलोक दीपित करता है तो कृष्णपक्ष का अंधकार विश्रामदायी है।
मुण्डकोपनिषद में अविद्या को अपरा विद्या और विद्या को परा विद्या कहा गया। श्वेताश्वतरोपनिषद् (5.1) में विद्या और अविद्या की खूबसूरत परिभाषा है -''क्षरं त्वविद्या ह्यमृतं तु विद्या, विद्याविद्ये ईशते यस्तु सोऽन्यः-जो क्षरणशील-नाशवान है वह अविद्या है, लेकिन सदा सनातन अमृत विद्या है।'' शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन में अविद्या ही मिथ्या है।
संसार का ज्ञान, घर परिवार भी जरूरी है। ब्रह्म ज्ञान की आकांक्षा इसी संसार की देन है। इसकी प्राप्ति के उपाय इसी जगत में, इसी शरीर और इन्द्रियों की सहायता से होते हैं। ईशोपनिषद के ऋषि ने अलग-अलग आग्रहों को गलत और दोनो के समन्वय को उपयोगी बताया है। अविद्या से सांसारिक कष्ट और मृत्यु कष्ट पार होते हैं। मृत्यु जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। जीवन के तल पर ही मृत्यु आती है। जीवन न हो तो मृत्यु क्या कर लेगी? लेकिन मृत्यु अचानक नहीं आती। जीवन के प्रत्येक क्षण में मृत्यु है। सर्जन और विसर्जन साथ-साथ चलते हैं। अविद्या से इसी सब का ज्ञान मिलता है। अविद्या सांसारिक बोध, यज्ञ, उपासना, ज्ञान विज्ञान की जानकारियों व जीवन की गतिविधि में सहायक है। विद्या आत्मानुभूति है।
कठोपनिषद (1.2.5) में कथा है। कथा के अनुसार यमराज ने जिज्ञासु नचिकेता से कहा, ''अविद्या में संलग्न स्वयं को धीर और पंडित बताते है। वे मूढ़पुरूष अंधे द्वारा ही ले जाए गए अंधमार्ग को प्राप्त होते हैं।'' यहां यमराज धन प्रेमी, संसारवादी लोगों की भी खबर लेते हैं, ''धनमोह, पुत्रमोह, पशु सम्पदा मोह में अंधे हो गए लोग इसी लोक को सच मानते हैं। ऐसे लोग बार-बार मेरे वश (यमराज के पाश में) में ही आते हैं।'' (वहीः6) यहां यमराज भी तात्कालिक दार्शनिक बहस के एक पक्षकार है, वे यज्ञ, संसार मोह, सम्पदा मोह, आदि को अंधकार में ले जाने वाला बताते हैं। फिर कहते हैं, ''यह परम तत्व बहुतों को सुनने को भी नहीं मिलता। सुनकर भी बहुत सारे लोग समझ नहीं पाते। जानकार तत्वज्ञानी बहुत कम है, ज्ञानियों में भी आत्मतत्व को प्राप्त सिद्ध बिरले ही हैं।'' (वहीः7) दर्शनशास्त्री तर्क को ज्ञान का उपकरण बताते थे। यमराज कहते हैं ''यह तत्व तर्क से नहीं मिलता ऐसा ज्ञान गैरनास्तिक (वेद जानने मानने वाला) अनुभवी विद्वान के पास ही होता है।''
अविद्या सांसारिक ज्ञान है। अर्थशास्त्र, इतिहास, विज्ञान, खगोल और वैदिक साहित्य भी 'अविद्या' है। दुख का कारण अविद्या है। अविद्या मूल सत्य तत्व पर आवरण है। इच्छाएं अभिलाषाएं और इनसे बनी बुद्धि अविद्या को सच्चा ज्ञान समझती है। अविद्या जनित बुद्धि से विद्याजनित उत्तर समझे नहीं जा सकते। बुद्ध इसीलिए सारभूत प्रश्नों पर मौन रहते थे। अविद्या को माया भी कह सकते हैं। माया सुंदर शब्द है। संस्कृत में 'मा' का अर्थ नहीं है। 'या' का अर्थ है 'जो'। माया अर्थात 'जो' नहीं है। जीवन में सब तरफ 'दो' ही दिखाई देते हैं। मैं हूं और संसार है। शुभ और अशुभ हैं। दिन और रात हैं। अच्छा और बुरा है। जीवन और मृत्यु है। व्यक्त और अव्यक्त है। ज्ञात और अज्ञात है। ईश्वर और संसार हैं। जीवात्मा और परमात्मा है। दर्शन की भाषा में इसे द्वैत कहते हैं। वैदिक काल और परवर्ती समय में अनेक मत थे। लेकिन मोटे तौर पर दो विचार थे। एक कि परमतत्व का बोध ही प्रकाशदायी है, बाकी सब गलत हैं। दो-कि भौतिक ज्ञान सांसारिक उपलब्धियां, यज्ञ कर्मकाण्ड ही ठीक है।
उत्तरवैदिक काल में इसे ''विद्या और अविद्या'' कहा गया। विद्या का अर्थ 'ज्ञान' और अविद्या का अर्थ अज्ञान लिया जाता है लेकिन वैदिक साहित्य में अविद्या का अर्थ अज्ञान नहीं है। वैदिक काल में विद्या सुपरिभाषित थी। इसका अर्थ सत्य की अनुभूति अथवा परमतत्व का ज्ञान था। इसलिए अविद्या का अर्थ ''जो विद्या नहीं है'' से लिया जाना चाहिए। परम सत्य की खोज से जुड़ा ज्ञान विद्या था, शेष सारा व्यावहारिक ज्ञान अविद्या था। विद्या मुक्ति का संधान थी-स विद्या या विमुक्तये। संसार कारण कार्य की श्रंखला है। कारण के अभाव से आगे कार्य नहीं होता। बुद्ध परम स्थिति को प्राप्त कर चुके थे। इसी स्थिति को निर्वाण (पाली भाषा में निब्बान) कहा गया। निर्वाण के बाद कोई ऐषणा नहीं बचती। प्राचीन दर्शन ने इसे मोक्ष कहा। मोक्ष एक लब्धि है।
यहां दार्शनिक सवाल उठे कि निर्वाण प्राप्त/मोक्ष प्राप्त व्यक्ति आगे कर्म करता हुआ क्या पुनः 'संस्कार' (दुख) में नहीं फंसेगा? और क्या इसी संस्कार के कारण उसका पुनर्जन्म नहीं होगा? बुद्ध ने दो प्रकार के कर्म बताये-एक आसक्त कर्म जो राग द्वेष आसक्ति से प्रेरित हैं और दूसरे अनासक्त कर्म-जिनमें फल प्राप्ति की कोई इच्छा नहीं होती। गीता का केन्द्रीय विचार भी अनासक्त कर्म है। बुद्ध ने खेती किसानी का खूबसूरत उदाहरण दिया, एक बीज सामान्य है, वह भूमि पर गिरेगा, तो दोबारा उगेगा (पुनर्जन्म होगा) दूसरा भुना हुआ बीज है, वह भूमि पर गिरकर भी नहीं उगता। निर्वाण प्राप्त व्यक्ति भुने बीज जैसा हैं। क्या अनासक्ति मुक्त करती है या मुक्त व्यक्ति अनासक्त होते हैं? शंकराचार्य के दर्शन में अज्ञान के आवरण के हटते ही व्यक्ति सत्य को उपलब्ध हो जाता है।
गीता में सृष्टि संचालन की प्राकृतिक कार्रवाई में सहयोग करने को यज्ञ बताया गया। (8.14) गीता में श्रीकृष्ण ने कहा ''मुक्त पुरुष को भी लोकसंग्रह के निमित्त अपना कर्म करते रहना चाहिए सामान्य जन श्रेष्ठजनों का अनुकरण करते है। (3.21) कृष्ण ने यह भी कहा कि मुझे कोई आकांक्षा नहीं है। दुनिया की कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है, जो मुझे प्राप्त नहीं है तो भी मैं सतत् कर्मरत रहता हूँ। मैं काम न करूं तो सृष्टि संचालन की कार्रवाई बाधित होगी और लोग मेरा अनुसरण करके आलस्य में जाएंगे।'' (3.22-24) बुद्ध ने भी लोकसंग्रह के निमित्त परम्परा का अनुसरण करते हुए निर्वाण के बाद भी सतत् कर्म जारी रखा।
बुद्ध के दृष्टिकोण से कर्मबन्धन 'संस्कार' बनते हैं। संस्कार से पुनर्जन्म होते हैं। ईशावास्योपनिषद् का ऋषि समूची सृष्टि को परमतत्त्व आच्छादित देख रहा था। प्रश्न यह था कि क्या परम तत्त्व की लब्धि के बाद भी काम करते रहना चाहिए? उपनिषद्कार ने कहा कि इस सृष्टि को परमतत्व से आच्छादित देखते हुए लगातार कर्मरत 100 वर्ष तक जीने की इच्छा करने से कर्म बन्धन नहीं लगते-एवं त्वपि नान्यथे तोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे (मंत्र 2) इसके अतिरिक्त कर्मबंधन से मुक्ति का कोई मार्ग नहीं है।
(लेखक - हृदयनारायण दीक्षित, उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं।)
