देश की आज़ादी के बाद जैसे इन क्रांतिकारियों का अस्तित्व ही खत्म हो गया।
इन्हीं में से एक हैं बटुकेश्वर दत्त! वही बटुकेश्वर दत्त जिन्होंने भगत सिंह के साथ असेंबली में बम फेंका, उनके साथ गिरफ्तार हुए और जब भगत सिंह को सांडर्स की हत्या के लिए फांसी की सजा हुई तो इन्हें काला पानी की सजा मिली।
भगत सिंह तो चले गये लेकिन लोगों के दिल में ऐसी जगह पा ली जो सदियों तक रहेगी। पर बटुकेश्वर, जिन्होंने आजीवन कारावास में जेल की प्रताड़नायें सही, और फिर जेल से बाहर आने के बाद भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन में योगदान दिया, उन्होंने आजादी के बाद की ज़िन्दगी गुमनामी में जी।
विदेशी सरकार जनता पर जो अत्याचार कर रही थी, उसका बदला लेने और उसे चुनौती देने के लिए क्रान्तिकारियों ने अनेक काम किए। ‘काकोरी’ ट्रेन की लूट और लाहौर के पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या इसी क्रम में हुई। तभी सरकार ने केन्द्रीय असेम्बली में श्रमिकों की हड़ताल को प्रतिबंधित करने के उद्देश्य से एक बिल पेश किया। क्रान्तिकारियों ने निश्चय किया कि वे इसके विरोध में ऐसा क़दम उठायेंगे, जिससे सबका ध्यान इस ओर जायेगा।
8 अप्रैल, 1929 ई. को भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केन्द्रीय असेम्बली के अन्दर बम फेंककर धमाका किया। बम इस तरह से बनाया गया था कि, किसी की भी जान न जाए। बम के साथ ही ‘लाल पर्चे’ की प्रतियाँ भी फेंकी गईं, जिनमें बम फेंकने का क्रान्तिकारियों का उद्देश्य स्पष्ट किया गया था। बम विस्फोट बिना किसी को नुकसान पहुंचाए सिर्फ पर्चों के माध्यम से अपनी बात को प्रचारित करने के लिए किया गया था।
असेम्बली में बम फेंकने के बाद बटुकेश्वर दत्त तथा भगतसिंह ने भागकर बच निकलने का कोई प्रयत्न नहीं किया, क्योंकि वे अदालत में बयान देकर अपने विचारों से सबको परिचित कराना चाहते थे। साथ ही इस भ्रम को भी समाप्त करना चाहते थे कि काम करके क्रान्तिकारी तो बच निकलते हैं पर अन्य लोगों को पुलिस परेशान करती है।
भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त दोनों गिरफ्तार हुए, उन पर मुक़दमा चलाया गया। 6 जुलाई, 1929 को भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अदालत में जो संयुक्त बयान दिया, उसका लोगों पर बड़ा प्रभाव पड़ा। भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त पर ‘लाहौर षड़यंत्र केस’ का मुक़दमा चलाया गया। जिसमें भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव को फाँसी की सज़ा दी गई थी, पर बटुकेश्वर दत्त के विरुद्ध पुलिस कोई प्रमाण नहीं जुटा पाई। उन्हें आजीवन कारावास की सज़ा काटने के लिए काला पानी जेल, अंडमान भेज दिया गया।
फांसी की सजा न मिलने पर देशभक्ति की भावना से भरे बटुकेश्वर बहुत निराश हुए। उन्होंने ये बात भगत सिंह तक पहुंचाई भी कि वतन पर शहीद होना ज्यादा फख्र की बात है, तब भगत सिंह ने उनको ये पत्र लिखा कि वे दुनिया को ये दिखाएं कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए मर ही नहीं सकते बल्कि जीवित रहकर जेलों की अंधेरी कोठरियों में हर तरह का अत्याचार भी सहन कर सकते हैं।
जेल में ही बटुकेश्वर दत्त ने 1933 और 1937 में ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। सेल्यूलर जेल से 1937 में वे बांकीपुर केन्द्रीय कारागार, पटना में लाए गए और 1938 में रिहा कर दिए गए। काला पानी से टीबी की गंभीर बीमारी लेकर लौटे बटुकेश्वर दत्त अपने इलाज के बाद फिर स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गये। जिसके कारण एक बार फिर वे गिरफ्तार हुए और चार वर्षों के बाद 1945 में रिहा किए गए।
साल 1947 में देश आजाद हो गया। वे पटना में रहने लगे। लेकिन उनकी जिंदगी का संघर्ष जारी रहा। रोजगार के लिए कभी सिगरेट कंपनी एजेंट तो कभी टूरिस्ट गाइड बनकर उन्हें पटना की सड़कों में घूमना पड़ा।
वे बिहार विधान परिषद के सदस्य भी बनाए थे. 1964 में बटुकेश्वर दत्त के बीमार होने पर उन्हें पटना के सरकारी अस्पताल ले जाया गया | जीवन के अंतिम समय में उन्हें सरकार की तरफ से तवज्जो देर से मिली जिसके कारण देश ने उन्हें खो दिया.
बाद में पता चला कि उनको कैंसर है और उनकी जिंदगी के कुछ ही दिन बाकी हैं। कुछ समय बाद पंजाब के मुख्यमंत्री रामकिशन उनसे मिलने पहुंचे। आंसूओ से भरी आंखों के साथ बटुकेश्वर दत्त ने मुख्यमंत्री से कहा,
“मेरी यही अंतिम इच्छा है कि मेरा दाह संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के बगल में किया जाए।”
20 जुलाई 1965 को भारत माँ का यह वीर इस दुनिया को अलविदा कह गया। बटुकेश्वर दत्त की अंतिम इच्छा को सम्मान देते हुए उनका अंतिम संस्कार भारत-पाक सीमा के करीब हुसैनीवाला में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की समाधि के पास किया गया।