हाल ही में लोकसभा के लिए सम्पन्न हुए चुनाव में भारतीय नागरिकों ने लगातार तीसरी बार एनडीए की अगुवाई में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी को सत्ता की चाबी आगामी पांच वर्षों के लिए इस उम्मीद के साथ पुनः सौंपी है कि आगे आने वाले पांच वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा देश में आर्थिक विकास को और अधिक गति देने के प्रयास जारी रखे जाएंगे। भारत की वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमन ने 23 जुलाई 2024 को मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का पहला बजट भारतीय संसद में पेश किया है। इस बजट के माध्यम से भारत की आर्थिक विकास दर को उच्च स्तर पर ले जाने का प्रयास किया गया है।
क्राँतिकारी कुंवर चैनसिंह का बलिदान
लेखक - -रमेश शर्मा
देखा जाए तो कोरोना के बाद से बच्चों में डिप्रेशन और एंजाइटी का रोग तेजी से बढ़ा है। कोरोना की दहशत के हालात, लॉकडाउन, वर्क फ्रॉम होम और बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई के साइड इफैक्ट सामने आने लगे हैं। ऑनलाइन स्टडी के चलते बच्चे तरह-तरह के ऐप से रूबरू होने लगे। इसससे बालपन सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। ऑनलाइन गेम्स की लत और सोशल मीडिया के प्रति बढ़ा आकर्षण नकारात्मक प्रभाव डालने में सफल रहा है। देखा जाए तो खेल-खेल में बच्चे ना चाहते हुए भी तनाव और एंजाइटी के दौर में प्रवेश कर जाते हैं। बदलती जीवनशैली और सामाजिक-आर्थिक सिनेरियो में सर्दी जुकाम की तरह एंजाइटी यानी कि घबराहट और डिप्रेशन आज के बच्चों में आम होता जा रहा है। जानी-मानी साइक्रेट्र्कि मैगजीन जामा साइक्रेट्री में हालिया प्रकाशित एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है। मनोवैज्ञानिकों ने 11 से 15 साल के बच्चों के बीच अध्ययन किया और खासतौर से यह समझने की कोशिश की कि जिस तरह से सर्दी जुकाम संक्रामक बीमारी है और एक से दूसरे में फैल जाती है उसी तरह से एंजाइटी या डिप्रेशन भी एक बच्चे से दूसरे बच्चे को प्रभावित कर सकता है क्या? अध्ययन में पाया गया कि घबराहट या एंजाइट प्रभावित बच्चे के लक्षण साथ वाले बच्चे में भी विकसित होते हैं। यह अध्ययन एक-दो नहीं बल्कि सात लाख बच्चों में किया गया है। हालात की गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि फिनलैंड विश्वविद्यालय के शोधार्थियों के अध्ययन में यह साफ हुआ है कि छह में से एक व्यक्ति बैचेनी यानी कि एंजाइटी से प्रभावित रहने लगा है। कोरोना के बाद इस तरह के मरीजों की संख्या में 60 फीसदी तक की बढ़ोतरी देखी जा रही है।
यदि अध्ययनकर्ताओं की मानें तो कोविड 19 के बाद हालात तेजी से विकट हुए हैं। खासतौर से पैसों वालों व बुजुर्गों की बीमारी से बच्चे भी प्रभावित होने लगे हैं। बैचेनी, घबराहट, हाथों में कंपन, नींद ना आना, चिड़चिड़ापन, तनावग्रस्त, कुंठा आदि लक्षण दिखने लगते हैं। इससे बच्चों में नकारात्मकता भी आ जाती है। अधिक चिंता की बात यह है कि यह बीमारी बच्चों में संक्रामक रोग की तरह फैलती जा रही है। लॉकडाउन के साथ ही पेरेंट्स की अंधी प्रतिस्पर्धा और अधिक से अधिक पाने की लालसा, बच्चों के बीच परस्पर सहयोग, समन्वय, मित्रता, सहभागिता के स्थान पर संवेदनहीनता और गलाकाट प्रतिस्पर्धा के परिणाम सामने आने लगे हैं। बच्चों में कुंठा तो आम होती जा रही है। रही सही कसर सोशल मीडिया ने पूरी कर दी है। सोशल मीडिया जो परस्पर संवाद का माध्यम बन सकता है वह तनाव का प्रमुख कारण बनता जा रहा है। लाइक-अनलाइक और कमेंट्स बालमन को नकारात्मक रुप से प्रभावित करता जा रहा है। ऑनलाइन अध्ययन के चलते बच्चों में मोबाइल का शौक लग गया है और उसका नकारात्मक असर वीडियो गेम्स के रूप में देखा जा सकता है । बच्चे को गेम के चक्कर में डिप्रेशन में चले जाते हैं। ओटीटी प्लेटफार्म भी अपना असर दिखाने लगा है। रील्स का तो कहना ही क्या? यह कहा जा सकता है कि बालमन को नकारात्मक रूप से प्रभावित करने वाले सभी कारक मौजूद हैं। शिक्षण संस्था हो या परिवार खासतौर से एकल परिवार के हालात हालात और भी गंभीर हैं। हालात यहां तक पहुंचे गए हैं बच्चों में आक्रामकता तेजी से घर रही है। बात-बात पर झगड़ना आमबात हो गई है।
समाज विज्ञानियों के सामने भी यह गंभीर समस्या चुनौती बन गई है। हालात बद से बदतर हों उससे पहले समस्या की गंभीरता को समझना होगा। दादा-दादी और नाना-नानी कहीं पीछे छूट रहे हैं। अभिभावक अवकाश में परिवार के साथ समय बिताने के स्थान पर घूमने जाना पसंद करने लगे हैं जिससे परिवार और परिवार से मिलने वाले संस्कार खोते जा रहे हैं। अत्यधिक तनाव के कारण बच्चों को आत्महत्या जैसे कदम उठाते देखा जा रहा है। दुनिया के देशों में जिस तरह से बच्चों को छोटी उम्र में ही हिंसक होते देखा जा रहा है, वह सबके सामने गंभीर चुनौती है। इसका समाधान नहीं खोजा गया तो आने वाली पीढ़ी किसी भी हालत में हमें माफ नहीं करेगी।
लेखक : डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
विचार शक्तिशाली होते हैं। पहले विचार के बीज आते हैं मन में, फिर वह हृदय और मस्तिष्क के गहरे तल पर जाते हैं। विचारों की धारणा मजबूत होती जाती है। जैसे ही यह धारणा मजबूत होती है, वैसे ही बीज में अंकुरण आरम्भ होता है। बीज वृक्ष बनता है। वृक्ष में फल-फूल आते हैं। बीज वट वृक्ष होता जाता है। यह विचारों के बीज सकारात्मक और नकारात्मक दोनों दिशा में जा सकते हैं। आप इन विचारों को स्वहित के लिए साध सकते हैं। इन विचारों को एक समूह के हितों के लिए तैयार कर सकते हैं अथवा अहित के लिए भी विचारों का प्रयोग कर सकते हैं। मुख्य बात है कि आपके भीतर उठने वाले विचार अच्छे हैं या बुरे हैं।
हमारी विचार दृष्टि क्या लोकहित के लिए है। महापुरुषों ने लोकहित को सर्वोपरि बताया है। बुद्ध कहते हैं कि लोक से बड़ा कोई नहीं है। यहां व्यक्तिगत कुछ भी नहीं है। पहले लगता है कि हमारे होने से कुछ बड़ा होने वाला है। मगर जब आप विचारों में गिरते हैं। डूबते हैं, निकलते हैं, तब यह धारणा मजबूत होती जाती है कि एक निश्चित कालखंड बाद के लिए लगा कि हमारा आपका होना कोई दुर्लभ घटना है, पर ऐसा है नहीं। यह सृष्टि हमेशा से ऐसी ही है। वैज्ञानिक कहते हैं कि कोई व्यक्ति जितना एक निश्चित समय तक काम करने में नहीं थकता, उससे अधिक व्यक्ति विचारों के लगातार करने-सोचने से थक जाता है। इस अस्तित्व में शुभ और अशुभ सुख-दुख साथ-साथ है। शास्त्रों में व्यक्ति तीन तरह से गुणों रजोगुण,तमोगुण और सतोगुण से युक्त बताए गए हैं।
गीता के अध्याय 14 श्लोक 5 में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि ऐ निष्पाप उन तीनों गुणों में सतो गुण तो निर्मित होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख से सम्बन्ध और ज्ञान के सम्बन्ध से अर्थात उसके अभिमान से बांधता है। यहां प्रकाश को श्रेष्ठ बताया गया है। प्रकाश ही ज्ञान है। प्रकृति में भी इन्हीं त्रिगुणा शक्तियों की महिमा बताई गई है। भारत में देवियों की संख्या तीन ही बताई गई है। ब्रह्मा-विष्णु-महेश त्रिदेव हैं। यहां पर भी बात त्रिगुणात्मिका शक्ति की है। वैज्ञानिक कहते हैं कि प्रोटान, न्यूट्रान, इलेक्ट्रॉन यहां पर भी तीन शक्तियां ही हैं। यह विज्ञान के पृथ्वी से अंतरिक्ष के सूत्र हैं। भारतीय दर्शन में सतोगुणी व्यक्ति को अच्छे विचारों वाला माना जाता है। रजोगुण वाले व्यक्ति को दूसरे और तमोगुणी को तीसरे दर्जे का व्यक्ति कहा गया है। मगर विचार तीनों तरह के मनुष्यों में उठते हैं । चाहे अच्छे विचार आएं या बुरे विचार आएं। किसी के लिए वे शुभ और किसी के लिए अशुभ हो सकते हैं। मगर विचार अपना काम करते हैं।
मनुष्य की श्रेष्ठता उसकी दूरदर्शिता में छिपी होती है। किसी व्यक्ति में सहिष्णुता होती है। किसी में नहीं होती है। कोई व्यक्ति बार-बार क्रोध में गिरता है। फिर वापस होता है। क्रोध से। फिर वह पश्चाताप में गिरता है कि सम्भवत: गलत हो गया। क्रोध अकारण थे। मगर विचार उसे रुकने नहीं देते। उसे स्थिर नहीं करते हैं। व्यक्ति के विचारों में स्थिरता आ जाए तो तब ही उसे क्रोध और अक्रोध दोनों के दर्शन होते हैं। जीवन के प्रवाह के लिए स्थिरता का घटित होना भी आवश्यक है।पतंजलि कहते है कि चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है। वृत्तियों को रोकना उन्हें वापस चैतन्य धन पुरुष के पास ले जाने वाले रास्ते पर लाना योग का पहला चरण है। जैसे विक्षिप्त अवस्था मन को बिखेर देती है। तब मन की प्रवृत्ति केवल सुख और दुख दो भागों में प्रकाशित होने की होती है। पतंजलि योग सूत्र प्रथम अध्याय (योगश्चित्त वृत्ति निरोध:)
हमें अपने विचारों पर लगातार ध्यान देना चाहिए। हमारे विचार कैसे हैं? क्या वे मनुष्यता के लिए कार्य कर रहे हैं? क्या हमारे विचार किसी सजृन की ओर ले जा रहे हैं। क्या सृजन के सपनों के साथ पंख फैलाकर मुक्त आकाश में उड़ने वाले विचार हैं। विचारों की शक्ति मात्र समाज में व्यक्तियों के ही बीच नहीं रहती । वह शक्ति अंतरिक्ष तक जाती है। हमारे विचार हवा की तरह उड़ते हैं। चलते हैं जहां उन्हे अपने अनुरूप वातावरण मिलता है वहां वे रुकते हैं। यहां भी ध्यान रहे सृजन और विध्वंस साथ हैं। विचार हमारी चेतना को ही नहीं अपितु पदार्थ को भी प्रभावित करते हैं। एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित कर देना विचारों की सामर्थ्य होती है। लम्बे समय तक यह धारणा थी कि कोई पूंजीपति,दबंग व्यक्ति या अन्य शक्तिशाली लोग ही प्रगति करते हैं। अब यह धारणा विदा हो गई।
पूरी दुनिया के सभी परिवर्तन मजबूत विचारों से ही पैदा हुए हैं और परिर्वतन सम्भव हो सका है। विचार जैसे आएं, उनको आदर दीजिए। नमस्कार कीजिए। मंथन कीजिए। और अन्त में उन्हें परिष्कृत करते हुए अपने जीवन में उनके सदुपयोग का मार्ग दीजिए। आपके अच्छे विचार आपको अच्छे मार्गों की ओर जाने को प्रेरित होंगे। आप अपने विचारों को लेकर व्यक्तिगत जीवन में और राष्ट्र जीवन में क्रान्ति और शांति दोनों ला सकते हैं। आपके विचार समाज के लिए शुभ हो सकते हैं। अपने विचारों वाला संगठन बना सकते हैं। जब एक विचार के एक से अधिक व्यक्ति साथ चलते हैं, तब संगठन बन जाता है। जब वैचारिक रूप से साथ-साथ हों, तभी अच्छे संगठन और राष्ट्र समाज का निर्माण सम्भव है।
भारत में लगातार वैदिककाल से अब तक इस बात पर अधिक जोर दिया गया कि अपने मन को पवित्र रखना अति आवश्यक है। पवित्र विचारों वाले लोग ही एक समय में सफल होते हैं। पवित्र मन वाले लोग उच्च शक्ति से लैस हो जाते हैं। प्रत्येक बार हमें अपनी वैचारिक सर्जना को प्रकट करते हुए जीवन यात्रा में निरन्तर आगे बढ़ना चाहिए। कई बार लगता है जो अच्छे विचारों वाले लोग नहीं है। उनकी प्रगति आसमान छू रही है। वे सर्वशक्तिमान दिखाई पड़ते हैं मगर ऐसे लोगों से प्रेरित होने की जरूरत नहीं लगती है। भारत में चाहे मर्यादा पुरुषोत्तम राम हों, श्रीकृष्ण हों, बुद्ध हों, महावीर हों, नानक हों या कबीर ,सभी सन्मार्ग पर ही चलने की बात करते हैं। आधुनिक संदर्भ में स्वामी विवेकानन्द, पं. श्रीराम शर्मा आचार्य भी महामार्ग की बात करते है। स्वामी विवेकानन्द कहते हैं कि स्वर्ग नर्क कहीं नहीं हमारे विचारों में है। विचार कहां से आते हैं। विज्ञान कहता है कि विचार एक ऊर्जा है। यह ऊर्जा व्यक्ति के अंतस में आती है। अमेरिकी लेखक डेल कारनेगी कहते हैं कि जीवन में मैंने सबसे महत्वपूर्ण बात सीखी तो है वह विचारों की शक्ति सर्वोच्च तथा अपार है। दुनिया के विचारकों और दार्शनिकों ने विचारों की ऊर्जा शक्ति को असाधारण माना है। प्रतिदिन कई बार सुखमय संसार दिखता है। अगले क्षण लगता है यह संसार रहने जैसा नहीं है। यह त्याग देने जैसा है। तो कोई कहता है यह क्षणभंगुर है। वैदिक साहित्य ढांढस देता है, कि कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा रखो । जीवेत शरद शतम। विचार विज्ञान को समझें। विचारों की शक्ति पर अपने समय में काफी काम हुआ है । यह माना गया कि ध्वनि ,प्रकाश और ताप की तरह चेतना क्षेत्र में विचारों की भी एक जीवंत शक्ति है। तभी अध्ययन का क्रम चला। सत्संग की व्यवस्था हुई । परामर्श और प्रवचन की शैली का विकास हुआ। विचारों ने विचारों को काटा और विचारों ने विचारों का समर्थन किया। व्यक्तियों और समाजों को ऊंचा उठाने गिराने में विचारों की असाधारण भूमिका रही है। कई बार लोगों के मौलिक विचार भी नहीं होते। मगर कुछ कर गुजरने की इच्छा गहरी होती है। किसी को अपना जीवन लक्ष्य बनाने के लिए कौन से विचार ग्रहण करने चाहिए, इसका सबसे सरल उपाय है कि विचारों को सुनना होगा। फिर मन में विचार करना होगा कि हमारे कौन से विचार श्रेष्ठ हैं। यह समझना होगा कि जिन विचारों को मन में गहरे ले जा रहे हैं, उनमें हमारा सामंजस्य है या नहीं। हमारी क्षमताएं उन विचारों के क्रियान्वयन के लिए तैयार हैं । उन्हें लागू करने के लिए बड़े संयम और धैर्य की आवश्यकता होती है। बुद्धिमानी इसी में है कि जो उपलब्ध है उसी का आनंद लिया जाए।
लेखक: अरुण कुमार दीक्षित
बजट हमेशा से भव्य घोषणाओं और प्रतीकात्मक प्रतीक रहा है। कार्यप्रणाली की तौर पर बजट सरकारी प्राप्तियों और व्यय का लेखा-जोखा होता है,लेकिन इसके साथ अक्सर कई महत्वपूर्ण घोषणाएं भी होती हैं।
इस साल का बजट पांच प्रमुख क्षेत्र ध्यान केंद्रित करता है ।
सबसे पहले और सबसे महत्वपूर्ण है राजकोषीय अनुशासन के प्रति चल रही प्रतिबद्धता,जो पिछले एक दशक से एनडीए सरकार की पहचान रही है। केंद्र ने महत्वाकांक्षी रूप से वित्त वर्ष 25 के लिए अपने राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को जीडीपी के 5.1 प्रतिशत से घटाकर 4.9 प्रतिशत कर दिया है। सरकार का लक्ष्य वित्त वर्ष 2025-26 तक अपने प्रस्तावित राजकोषीय ग्लाइड पथ का सख्ती से पालन करते हुए राजकोषीय घाटे को वित्त वर्ष 26 तक 4.5 प्रतिशत या उससे कम करना है। यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकारी व्यय हमारी आर्थिक वृद्धि का प्रमुख साधन है। इस ग्लाइड पथ पर टिके रहना,विशेष रूप से इन परिस्थितियों में सराहनीय है। आरबीआई से बढ़ा हुआ लाभांश सरकार के लिए मददगार रहा है।
दूसरा,यह बजट अपने पिछले बजटों की तरह ही है,जिसमें 11,11,111 करोड़ रुपये या जीडीपी का 3.4 प्रतिशत पूंजीगत व्यय को दिया गया है। इस निवेश का उद्देश्य बुनियादी ढांचे के विकास के शक्तिशाली गुणक प्रभाव का दोहन करना है। सुकन्या बोस और एनआर भानुमूर्ति द्वारा किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि पूंजीगत व्यय गुणक 2.45 है,जो 0.98 के हस्तांतरण भुगतान गुणक और 0.99 के अन्य राजस्व व्यय गुणकों से कहीं अधिक है।
बजट में राज्यों को पूंजीगत व्यय करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है और दीर्घावधि ब्याज मुक्त ऋण के लिए 1.5 लाख करोड़ का प्रावधान किया गया है। निजी क्षेत्र को व्यवहार्यता अंतर वित्तपोषण (financing),सक्षम नीतियों और बाजार आधारित वित्तपोषण (Enabling policies and market based financing) ढांचे के माध्यम से भी बढ़ावा दिया जाएगा। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना (पीएमजीएसवाई) के चरण IV जैसी विशिष्ट पहलों का उद्देश्य 25,000 ग्रामीण बस्तियों को सभी मौसमों में कनेक्टिविटी प्रदान करना है। बिहार, असम, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम में बाढ़ शमन और सिंचाई परियोजनाओं के लिए भी महत्वपूर्ण निवेश आवंटित किए गए हैं, जो तत्काल जरूरतों और दीर्घकालिक लचीलेपन को संबोधित करते हैं।
तीसरा, बजट ने सरलीकरण को बढ़ावा देने और जटिलता को कम करने की कोशिश की है। नियमों, क़ानूनों और नीतियों को सरल बनाने से सहजता हुई है, सुव्यवस्थित विनियमन स्पष्टता और पूर्वानुमान प्रदान करते हैं, जिससे व्यवसायों और व्यक्तियों के लिए नियमपालन और प्रशासनिक बोझ को कम करते हैं। यह एक प्रतिस्पर्धी बाजार वातावरण को बढ़ावा देता है, जिससे नवाचार और विस्तार जैसी उत्पादक गतिविधियों के लिए तेजी से निर्णय लेने और संसाधन आवंटन को सक्षम किया जाता है। नागरिकों के लिए, सरलीकृत नीतियाँ सरकारी सेवाओं तक पहुँच में सुधार करती हैं, नौकरशाही बाधाओं को कम करती हैं और अनुपालन को अधिक सरल बनाकर समावेशिता को बढ़ावा देती हैं।
वित्त मंत्री ने अगले छह महीनों में कर ढांचे की व्यापक समीक्षा का प्रस्ताव दिया है ताकि इसे आसान व्यापार, शुल्क प्रत्यावर्तन को खत्म करने और विवादों को कम करने के लिए तर्कसंगत और सरल बनाया जा सके। इसके अलावा, कुछ साल पहले, सरकार ने कम छूट के साथ एक सुव्यवस्थित कर व्यवस्था शुरू की थी। अधिक करदाताओं को इस प्रणाली को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए, बजट ने कर स्लैब में बदलाव करके और मानक कटौती को बढ़ाकर 75,000 रुपये करके इसे और अधिक आकर्षक बना दिया है। इसके अलावा, वित्त मंत्री ने यह भी घोषणा की है कि आयकर अधिनियम, 1961 की व्यापक समीक्षा की जाएगी, जिसका उद्देश्य अधिनियम को संक्षिप्त, सुस्पष्ट, पढ़ने और समझने में आसान बनाना है।
इसके अलावा, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) और विदेशी निवेश के लिए नियम और विनियमन को सरल बनाया जाएगा ताकि विदेशी निवेश को सुविधाजनक बनाया जा सके, रणनीतिक प्राथमिकता को बढ़ावा दिया जाए और विदेशी निवेश के लिए भारतीय रुपये के उपयोग को बढ़ावा दिया जा सके। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि इन विनियमों को सरल बनाने से अधिक विदेशी निवेश आकर्षित होंगे, प्रमुख क्षेत्रों पर संसाधनों को केंद्रित करने में मदद मिलेगी और भारतीय रुपये की वैश्विक उपस्थिति मजबूत होगी।
इसके अलावा, सरकार ने दीर्घ अवधि के पूंजीगत लाभ (कैपिटल गेन) कर को भी तर्कसंगत (रैशनल) बनाया है। संपत्ति की बिक्री पर इंडेक्सेशन लाभ को हटाने से निश्चित रूप से सरलीकरण होगा। हालांकि, यह स्वीकार करना होगा कि इससे समग्र कर देयता भी बढ़ेगी। इससे रियल एस्टेट बाजार पर असर पड़ेगा।
वित्त मंत्री ने जन विश्वास विधेयक 2.0 को लागू करने की सरकार की मंशा का भी उल्लेख किया। इससे भारत में व्यापार और जीवन को और अधिक आसान बनाने में मदद मिलेगी।
चौथा, रोजगार सृजन पर ध्यान केन्द्रित हुआ है। पीएलएफएस डेटा में रिकॉर्ड-कम बेरोजगारी का संकेत दिए जाने के बावजूद, सरकार स्थायी, उच्च-गुणवत्ता वाले रोजगार के अवसर पैदा करने की महत्वपूर्ण आवश्यकता को स्वीकार करती है। केंद्रीय बजट ने एक व्यापक "रोजगार से जुड़ी प्रोत्साहन" (ईएलआई) योजना के माध्यम से रोजगार सृजन को प्राथमिकता दी है, जिसमें तीन लक्षित पहल शामिल हैं। योजना ए औपचारिक क्षेत्र में पहली बार काम करने वाले कर्मचारियों को एक महीने के वेतन का 15,000 रुपये तक का प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण प्रदान करती है, जिसकी अनुमानित पहुंच 210 लाख युवाओं तक है। योजना बी चार वर्षों में कर्मचारियों और नियोक्ताओं दोनों के लिए ईपीएफओ योगदान को कवर करके विनिर्माण क्षेत्र में अतिरिक्त रोजगार को प्रोत्साहित करती है, जिससे 30 लाख व्यक्तियों को लाभ होता है। योजना सी नियोक्ताओं को दो वर्षों के लिए ईपीएफओ योगदान के लिए प्रति माह 3,000 रुपये तक की प्रतिपूर्ति करती है, जिससे 50 लाख अतिरिक्त श्रमिकों को रोजगार मिलता है।
इसके अतिरिक्त, बजट का उद्देश्य बुनियादी ढांचे के समर्थन और विशेष कौशल कार्यक्रमों के माध्यम से महिलाओं की कार्यबल भागीदारी को बढ़ाना और पांच वर्षों में 20 लाख युवाओं को लक्षित करने वाली एक नई कौशल पहल के तहत 1,000 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों को उन्नत करना है। अंत में, कौशल विकास और उच्च शिक्षा का समर्थन करने के लिए संशोधित कौशल ऋण और नए शिक्षा ऋण पेश किए गए हैं, जिससे क्रमशः 25,000 और 1 लाख छात्र सालाना लाभान्वित होंगे।
पांचवां, यह बजट सुधारोन्मुख(reform oriented) है और मोदी 3.0 में सुधारों के लिए एक खाका तैयार करता है, जिसका लक्ष्य उच्च विकास और रोजगार को प्रोत्साहित करने के लिए अगली पीढ़ी के आर्थिक संवर्द्धन को लक्षित करना है। यह भूमि, श्रम, पूंजी, उद्यमिता और प्रौद्योगिकी का लाभ उठाने की उत्पादकता में सुधार के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण को दर्शाता है। भूमि सुधार कैडस्ट्रल मानचित्रों को डिजिटल बनाने, भूमि रजिस्ट्री स्थापित करने और जीआईएस-आधारित संपत्ति रिकॉर्ड सिस्टम को लागू करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जिससे भूमि प्रशासन और शहरी वित्तीय स्वास्थ्य में सुधार होता है। श्रम सुधारों का उद्देश्य व्यापक डेटाबेस और नए सिरे से तैयार श्रम सुविधा और समाधान पोर्टल के माध्यम से रोजगार और कौशल सेवाओं को एकीकृत करना है, अनुपालन और नौकरी-बाजार मिलान को अनुकूलित करना है।
पूंजी और उद्यमिता सुधार वित्तीय क्षेत्र के लिए एक दृष्टिकोण और रणनीति दस्तावेज पेश करते हैं, आकार, क्षमता और कौशल के संदर्भ में क्षेत्र को तैयार करते हैं, और हरित संक्रमण पहलों का समर्थन करने के लिए जलवायु वित्त के लिए एक वर्गीकरण विकसित करते हैं। इसके अतिरिक्त, एक परिवर्तनीय पूंजी कंपनी संरचना के लिए विधायी समर्थन विमान और जहाजों को पट्टे पर देने के लिए लचीले वित्तपोषण तंत्र और निजी इक्विटी के लिए पूल किए गए फंड प्रदान करेगा, जिससे अर्थव्यवस्था की वित्तपोषण आवश्यकताओं को कुशलतापूर्वक संबोधित किया जा सकेगा।
एक संतुलित बजट है जो अपने संतुलित दृष्टिकोण के लिए जाना जा रहा है, जो राजकोषीय अनुशासन, पूंजीगत व्यय, विनियामक सरलीकरण, रोजगार सृजन और अगली पीढ़ी के सुधारों पर ध्यान केंद्रित करता है, जिसका उद्देश्य उच्च विकास और रोजगार को बढ़ावा देना है।
कुग्रामवास: कुलहीन सेवा, कुभोजन क्रोधमुखी च भार्या |
पुत्रश्च मूर्खो विधवा च कन्या, विनाग्निमेते प्रदहन्ति कायम ||
आशय, यह है कि ये सब बातें व्यक्ति को भारी दुःख देती हैं -यदि दुष्टों (लम्पटों) के बीच में रहना पड़े, नीच खानदान वाले की सेवा करनी पड़े, घर में झगड़ालू कर्कशा पत्नी हो, पुत्र मुर्ख हो, पढ़े-लिखे नहीं, बेटी विधवा हो जाए -ये सारे दुःख बिना आग के ही व्यक्ति को अंदर-ही-अंदर से जला डालते हैं |
नारद ने मन में सोचा- 'भक्त का चरणोदक भगवान् के श्रीमुख में !' आखिर रुक्मिणी के पास जाकर उन्होंने सारा हाल कह सुनाया | रुक्मिणी भी बोलीं, "नहीं, नहीं! देवर्षि, मैं यह पाप नहीं कर सकती |" नारद ने लौटकर रुक्मिणी की असहमति कृष्ण के पास व्यक्त कर दी | तब कृष्ण ने उन्हें राधा के पास भेजा | राधा ने जो सुना, तो तत्क्षण एक पात्र में जल लाकर उसमें अपने दोनों पैर डुबो दिया और नारद से बोलीं, "देवर्षि, इसे तत्काल कृष्ण के पास ले जाइये | मैं जानती हूँ, इससे मुझे रौरव नर्क मिलेगा, किन्तु अपने प्रियतम के सुख के लिए मैं अनन्त युगों तक यातना भोगने को प्रस्तुत हूँ |" और देवर्षि समझ गये कि तीनों लोकों में राधा के ही प्रेम की स्तुति क्यों हो रहे है |
