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भारतीय वैज्ञानिकों ने बच्चों में पाया दुर्लभ USP18 जीन म्यूटेशन, दुनिया में पहला ऐसा मामला

Date : 29-Nov-2025

भारतीय शोधकर्ताओं ने बच्चों में बार-बार होने वाली न्यूरोलॉजिकल गिरावट से जुड़े USP18 जीन के एक अत्यंत दुर्लभ म्यूटेशन की पहचान की है। दुनियाभर में ऐसे केवल 11 मामले ही दर्ज किए गए थे, और भारत में यह पहला मामला है। यह उपलब्धि इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ (बेंगलुरु) द्वारा रामजस कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) और रेडक्लिफ लैब्स के सहयोग से हासिल की गई है। शोध को Clinical Dysmorphology जर्नल में प्रकाशित किया गया है।

यह म्यूटेशन किस रोग से जुड़ा है?

यह नया पाया गया म्यूटेशन Pseudo-TORCH syndrome type-2 से संबंधित है—
एक बेहद दुर्लभ आनुवंशिक रोग, जिसमें बच्चों में ऐसे न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखते हैं जो जन्मजात संक्रमण जैसे प्रतीत होते हैं, जबकि वास्तव में कोई संक्रमण मौजूद नहीं होता।

USP18 जीन सामान्यतः प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को नियंत्रित करता है।
जब यह जीन ठीक से काम नहीं करता, तो इम्यून सिस्टम अत्यधिक सक्रिय हो जाता है, जिससे मस्तिष्क को नुकसान पहुँचने लगता है।

शोध में मिला नया और अनोखा म्यूटेशन

शोधकर्ताओं ने USP18 जीन में पहले कभी रिपोर्ट न किए गए
c.358C>T (p.Pro120Ser) वेरिएंट की पहचान की।
यह खोज इस बीमारी के मूल कारणों को समझने में महत्वपूर्ण प्रगति मानी जा रही है।

विशेषज्ञों की राय

IGICH के बाल न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. व्यकुंतराजु के. गौड़ा ने कहा:

“सालों तक हम सिर्फ लक्षणों के आधार पर इलाज करते रहे। अब इस दुर्लभ USP18 म्यूटेशन की पहचान ने निदान को बदल दिया है और बच्चे के भविष्य को भी।”

उनके अनुसार इस खोज से—
✔ गलत या अनावश्यक इलाज से बचाव
✔ सही उपचार रणनीति का चयन
✔ परिवारों को सटीक जेनेटिक काउंसलिंग
—सब संभव हुआ है।

कैसे पता चला म्यूटेशन?

अध्ययन एक 11 वर्षीय बच्ची से शुरू हुआ, जिसमें शैशवावस्था से ही ये लक्षण थे:

  • बार-बार बुखार के दौरान बेहोशी

  • दौरे (seizures)

  • विकास में देरी

  • सिर छोटा होना (microcephaly)

  • समय के साथ दिमाग में कैल्शियम जमा होना

उस पर एक्सोम सीक्वेंसिंग और माइटोकॉन्ड्रियल जीनोम सीक्वेंसिंग की गई, जिससे यह नया म्यूटेशन सामने आया।

सह-अनुसंधानकर्ता डॉ. हिमानी पांडे ने बताया:

“यह USP18 म्यूटेशन के कारण बार-बार होने वाली febrile encephalopathy का दुनिया में पहला मामला है।”

शोध का महत्व

यह अध्ययन दर्शाता है कि जब बच्चों में कारण स्पष्ट न होने पर गंभीर न्यूरोलॉजिकल समस्याएँ दिखाई दें, तो जल्दी जेनेटिक टेस्टिंग करना बेहद जरूरी है। इससे सही बीमारी का पता लगाकर समय रहते उपचार और काउंसलिंग की जा सकती है।


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