अब धरती पर बिजली का आगमन अंतरिक्ष से होगा, बिना खंभों और तारों के जानिए, यह कैसे आम घरों तक पहुंचेगी Date : 31-Oct-2024 अब धरती पर बिजली अंतरिक्ष से आएगी बिना खंभों और तारों के। यह संभव करने के लिए एक ब्रिटिश स्टार्टअप ने "स्पेस सोलर पावर प्रोजेक्ट" का प्रस्ताव रखा है, जो दावा करता है कि केवल 30 मेगावॉट ऊर्जा की बीम से 3,000 घर रोशन हो सकते हैं। क्या अंतरिक्ष से पृथ्वी पर बिजली की सप्लाई संभव है? हां, निकट भविष्य में यह सच होने जा रहा है। अमेरिका, चीन, और जापान सहित कई देश इस क्षमता को हासिल करने की कोशिश में हैं। यह ब्रिटिश स्टार्टअप 2030 तक एक सैटेलाइट के जरिए बिजली सप्लाई शुरू करने का लक्ष्य रखता है, जिसमें आइसलैंड को पहला लाभ मिलेगा। अगर यह प्रयास सफल होता है, तो यह रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में एक नई क्रांति होगी। चाहे मौसम कैसा भी हो, सैटेलाइट से सातों दिन, 24 घंटे बिजली उपलब्ध होगी। ब्रिटेन की स्पेस सोलर, आइसलैंड की रिकजेविक एनर्जी और ट्रांजिशन लैब मिलकर इस परियोजना पर काम कर रहे हैं, जिसमें एक ऐसा सैटेलाइट लॉन्च करने की योजना है जो 30 मेगावॉट ऊर्जा की बीम पृथ्वी पर भेजेगा, जिससे लगभग 3,000 घरों को रोशन किया जा सकेगा। यह सैटेलाइट लगभग 400 मीटर चौड़ा होगा और इसका वजन 70.5 टन तक हो सकता है। यह पृथ्वी की मध्यम कक्षा में 2,000 से 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई पर परिक्रमा करेगा। ऊर्जा को हाई-फ्रीक्वेंसी रेडियो तरंगों के रूप में भेजा जाएगा, जिसे जमीन पर रिसीविंग एंटेना इकट्ठा करके बिजली में बदल देंगे और पावर ग्रिड में भेजेंगे। एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स, इस सैटेलाइट को लॉन्च करेगी, जो स्टारशिप मेगारॉकेट के जरिए अंतरिक्ष में भेजा जाएगा। स्पेस सोलर पावर प्रोजेक्ट का लक्ष्य 2036 तक छह अंतरिक्ष-आधारित सौर ऊर्जा स्टेशनों की एक फ्लीट तैयार करना है, जिसमें से प्रत्येक स्टेशन पर लगभग 80 करोड़ डॉलर (करीब 67.26 अरब रुपए) का खर्च आएगा। इस सिस्टम में पारंपरिक अक्षय ऊर्जा स्रोतों की तरह बिजली उत्पादन में रुकावट नहीं होगी। सुनामी के कारणों की खोज में, ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रीय विश्वविद्यालय (एएनयू) के शोधकर्ताओं और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों का एक दल जापान ट्रेंच के अनूठे मिशन पर जा रहा है। जापान ट्रेंच, उत्तरी प्रशांत महासागर के पश्चिमी भाग में स्थित एक समुद्री खाई है, जिसकी गहराई लगभग आठ किलोमीटर (8046 मीटर) है। शोधकर्ता अत्याधुनिक उपकरणों का उपयोग करके समुद्र के तल में लगभग एक किलोमीटर की गहराई तक ड्रिल करेंगे और प्राप्त नमूनों का व्यापक अध्ययन करेंगे। अभियान के निदेशक प्रोफेसर रॉन हैकनी के अनुसार, इस अभियान का एक उद्देश्य 2011 के विनाशकारी भूकंप के बाद के चट्टानी नमूनों में हुए बदलावों की जांच करना भी है। यह अभियान लगभग सात महीने तक चलेगा और इसे अंतरराष्ट्रीय महासागर खोज कार्यक्रम (IODP) का अंतिम चरण माना जा रहा है। पिछले एक दशक में 81 ऑस्ट्रेलियाई और न्यूजीलैंड के वैज्ञानिक विभिन्न ड्रिलिंग अभियानों में भाग ले चुके हैं। Read More
नासा ने स्पेस रिसर्च में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए गुरुत्व तरंगों को पकड़ने के लिए एक विशेष टेलीस्कोप Date : 30-Oct-2024 नासा ने स्पेस रिसर्च में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए गुरुत्व तरंगों को पकड़ने के लिए एक विशेष टेलीस्कोप, जिसे लीसा मिशन कहा जाता है, को स्पेस में भेजने का निर्णय लिया है। इस मिशन का प्रोटोटाइप भी जारी किया गया है। लेजर इंटरफेरोमीटर स्पेस एंटीना (लीसा) अभियान नासा और यूरोपीय स्पेस एजेंसी (ईसा) के सहयोग से संचालित होगा, जिसमें 2030 तक कुल छह टेलीस्कोप अंतरिक्ष में स्थापित किए जाएंगे। क्या और कितना खास है ये मिशन लीसा मिशन एक विशेष डिजाइन का उपयोग करेगा, जिसमें त्रिभुजाकार संरचना होगी। इसमें तीन अंतरिक्ष यान शामिल होंगे, जिनमें से हर दो यानों के बीच की दूरी लगभग 24 लाख किलोमीटर होगी। प्रत्येक यान में दो जुड़वां दूरबीनें स्थापित की जाएंगी, जिससे कुल छह टेलीस्कोप का उपयोग किया जाएगा ताकि एक गुरुत्व तरंग को पकड़ा जा सके। यानों के बीच की यह दूरी पूरे सिस्टम को सूर्य से भी बड़ा बना देगी। गुरुत्व तरंगों की अवधारणा महान भौतिकविद अल्बर्ट आइंस्टीन ने सौ साल से अधिक समय पहले प्रस्तुत की थी, लेकिन इन्हें स्पेस से देखने का पहला अवसर 2016 में मिला। वर्तमान में, दुनिया में ऐसी तरंगों को देखने के लिए केवल दो प्रयोगशालाएं हैं—एक अमेरिका में LIGO और दूसरी यूरोप में VIRGO। अब नासा ने इन तरंगों को स्पेस में पकड़कर उनकी अध्ययन करने का निर्णय लिया है, जिसमें वह ईसा की मदद लेगा। क्या होती हैं ये गुरुत्व तरंगें और बहुत कुछ गुरुत्व तरंगें स्पेसटाइम के ताने-बाने में उत्पन्न हलचल हैं, जो बड़े पिंडों के प्रभाव से बनती हैं। इनका अनुमान पहले सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत में महान भौतिकविद आइंस्टीन ने लगाया था। ये तरंगें प्रकाश की गति से चलती हैं और ब्लैक होल या न्यूट्रॉन तारों के टकराव, या विशाल तारों के सुपरनोवा विस्फोट के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती हैं। पूरा सिस्टम अंतरिक्ष यान के बीच सूक्ष्म दूरी में बदलावों को मापने के लिए लेजर का उपयोग करेगा, जिससे ब्लैक होल के विलय जैसी ब्रह्मांडीय घटनाओं से गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता लगाया जा सकेगा। नासा इन सभी छह महत्वपूर्ण हिस्सों को प्रदान करने की जिम्मेदारी लेगा। हाल ही में अनावरण किया गया प्रोटोटाइप, जिसे इंजीनियरिंग डेवलपमेंट यूनिट टेलीस्कोप कहा जाता है, अंतिम उड़ान हार्डवेयर के विकास के लिए एक मार्गदर्शक के रूप में कार्य करेगा। इसका निर्माण न्यूयॉर्क के रोचेस्टर में L3Harris टेक्नोलॉजी ने किया है। यह प्रोटोटाइप टेलीस्कोप मई में नासा के गोडार्ड स्पेस फ़्लाइट सेंटर में पहुंचा। इसके प्राथमिक आईने पर इन्फ्रारेड लेजर रिफ्लेक्शन को बढ़ाने और अंतरिक्ष के ठंडे वैक्यूम में गर्मी के नुकसान को कम करने के लिए एक सोने की कोटिंग की गई है। यह टेलीस्कोप पूरी तरह से जीरोडुर से बना है, जो एक एम्बर रंग का ग्लास-सिरेमिक है और इसकी असाधारण तापीय स्थिरता के लिए जाना जाता है। यह सामग्री, जो जर्मनी के मेंज में निर्मित हुई है, विभिन्न तापमानों में दूरबीन के सटीक आकार को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, कुछ प्रकार की गुरुत्वाकर्षण तरंगों को अन्य की तुलना में देखना अधिक चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि विभिन्न पिंडों के टकराने से कई फ्रीक्वेंसी की तरंगें उत्पन्न होती हैं। इसलिए, खगोलविद अंतरिक्ष में गुरुत्वाकर्षण डिटेक्टर लगाने का प्रयास कर रहे हैं, जिससे खोज की सटीकता में काफी सुधार होगा। यह तीन अंतरिक्ष यान को समबाहु त्रिभुज के आकार में लॉन्च करेगा, जो सूर्य की परिक्रमा करेंगे। इस प्रकार, वे एक विशाल इंटरफेरोमीटर का एनालॉग बनाएंगे। जब एक गुजरती गुरुत्वाकर्षण तरंग स्पेसटाइम के ताने-बाने को बिगाड़ती है, तो उपग्रहों के बीच की दूरी में थोड़ा बदलाव आएगा, जिससे तरंगों के होने का पता चलेगा। इस बदलाव की डिग्री का विश्लेषण करके, LISA गुरुत्वाकर्षण तरंग की उत्पत्ति और यह ब्रह्मांड के किस भाग से आई है, यह भी निर्धारित कर सकेगी। लिसा की अभूतपूर्व संवेदनशीलता के कारण, यह पिकोमीटर स्केल यानी एक मीटर के खरबवें हिस्से तक गुरुत्वाकर्षण तरंगों का पता लगाने में सक्षम होगी। यह क्षमता ब्रह्मांड के अध्ययन के लिए नए रास्ते खोलेगी, पारंपरिक खगोलीय अवलोकनों को पूरा करने में मदद करेगी, और ब्रह्मांडीय घटनाओं की हमारी समझ को बेहतर बनाएगी। Read More
Apple इस तरह बदलेगा डिजाइन और फीचर्स: आईफोन 17 प्रो मैक्स Date : 29-Oct-2024 अगले साल आईफोन 17 सीरीज के लॉन्च की तैयारी की जा रही है, जिसमें आईफोन 17 प्रो मैक्स को नए और अपडेटेड डिजाइन के साथ पेश किया जा सकता है। इसके साथ ही कुछ फीचर्स में भी अपग्रेड देखने को मिल सकते हैं। आइए जानते हैं कि एपल नए आईफोन 17 प्रो मैक्स में क्या बदलाव ला सकती है। आईफोन निर्माता कंपनी एपल आगामी आईफोन 17 सीरीज पर काम कर रही है। आईफोन 16 सीरीज के लॉन्च के बाद से इस नई सीरीज के बारे में चर्चा तेज हो गई है। इंटरनेट पर इसके बारे में लगातार लीक्स और अफवाहें सामने आ रही हैं। कहा जा रहा है कि आईफोन 17 प्रो मैक्स को नए और अपडेटेड डिजाइन के साथ पेश किया जा सकता है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अगले साल सितंबर में आईफोन का रंग-रूप पूरी तरह से बदल सकता है। आईफोन 17 प्रो मैक्स की स्क्रीन में भी अपडेट होने की उम्मीद है। इसके अलावा, एपल आईफोन के डिस्प्ले में इस्तेमाल होने वाली तकनीक को एपल वॉच की तकनीक के साथ मिला सकती है। iPhone 17 Pro Max: क्या होगा नया डिजाइन? एपल आईफोन 17 प्रो मैक्स में 5 बड़े बदलावों की संभावना जताई जा रही है। iPhone 17 Pro Max में छोटे डायनामिक आइलैंड के साथ नया फेस आईडी सिस्टम मिलने की संभावना है। • अगले साल के प्रो मॉडल में अपग्रेडेड 48MP टेलीफोटो कैमरा और 24MP सेल्फी कैमरा की उम्मीद है। • इसमें बेहतर प्रदर्शन और AI फीचर्स के लिए 12GB रैम के साथ A19 Pro चिपसेट दिया जा सकता है। • एपल iPhone 17 Pro Max के लिए एक एक्सक्लूसिव बटन पेश कर सकता है, जो वॉल्यूम और एक्शन बटन दोनों फंक्शन को नियंत्रित करेगा। • आईफोन 17 प्रो मैक्स नए ग्रीन टाइटेनियम या टील टाइटेनियम रंग में लॉन्च किया जा सकता है। आईफोन में एपल वॉच जैसी तकनीक एक कोरियाई वेबसाइट की रिपोर्ट में कहा गया है कि Apple Watch Series 10 के लेटेस्ट वर्जन में डिस्प्ले का स्वरूप बदला गया है। इसी तरह का बदलाव अगले साल लॉन्च होने वाले एपल आईफोन के डिस्प्ले में भी किया जा सकता है। Apple Watch Series 10 में LTPO3 डिस्प्ले का उपयोग किया गया है। हालांकि, एपल ने इन बदलावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। Read More
कितना खास है C-295 एयरक्राफ्ट, जिसका उद्घाटन प्रधानमंत्री मोदी जी ने किया Date : 28-Oct-2024 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और स्पेन के पीएम पेड्रो सांचेज ने सोमवार को गुजरात के वडोदरा में C-295 एयरक्राफ्ट के निर्माण के लिए टाटा एयरक्राफ्ट कॉम्प्लेक्स का उद्घाटन किया। यह भारत में मिलिट्री एयरक्राफ्ट के लिए प्राइवेट सेक्टर की पहली असेंबली लाइन है। इस डील के तहत वडोदरा फैसिलिटी में कुल 56 मिलिट्री टेक्टिकल ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट बनाए जाएंगे, जिनमें से 16 एयरक्राफ्ट को एयरबस सीधे डिलीवर करेगी। C-295 एयरक्राफ्ट की निर्माण प्रक्रिया से भारत को ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट के निर्माण में दक्षता हासिल होगी। आइए, इसकी खासियतों पर नज़र डालते हैं। C-295 की क्षमता 5 से 10 टन है और यह इंडियन एयरफोर्स के Avro-748 विमानों को रिप्लेस करेगा। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, C-295 एक बेहतर विमान माना जाता है, जो 71 सैनिकों या 50 पैराट्रूपर्स को रसद के साथ उन स्थानों पर पहुंचा सकता है जहां भारी एयरक्राफ्ट नहीं जा सकते। यह विमान 260 नॉट की स्पीड से उड़ान भर सकता है और छोटी हवाई पट्टियों से भी उड़ान ले सकता है। यह कच्ची, सॉफ्ट, रेतीली या घास वाली हवाई पट्टियों पर भी लैंड कर सकता है। C-295 लगातार 11 घंटे तक उड़ान भर सकता है और हर मौसम में कार्यशील रह सकता है। यह रेगिस्तान से लेकर समुद्री इलाकों में, दिन और रात, अपने मिशनों को पूरा कर सकता है। घायलों के परिवहन के लिए इसे एक ICU के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। इसमें हवा से हवा में फ्यूल भरने की सुविधा भी है, और रैंप डोर की मदद से एयरक्राफ्ट में मौजूद सैनिकों और कार्गो को ड्रॉप किया जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, सभी 56 एयरक्राफ्ट में भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और भारत डायनेमिक्स लिमिटेड के बनाए स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सूट भी लगाए जाएंगे। C-295 की उड़ान की ऊंचाई 30,000 फीट तक हो सकती है। इस एयरक्राफ्ट का उपयोग चाड, इराक और अफगानिस्तान में किया गया है, और यह ब्राजील के गर्म जंगलों और कोलंबिया के पहाड़ों में भी उड़ान भरता रहा है। इसके अलावा, C-295 ने पोलैंड, फिनलैंड और कजाकिस्तान के ठंडे इलाकों में भी सफल उड़ानें भरी हैं। Read More
क्या है NISAR मिशन? नासा और इसरो की भूमिका कितनी है Date : 27-Oct-2024 निसार सैटेलाइट के मिशन को सफल बनाने के लिए नासा और इसरो ने मिलकर इसके रडार एंटीना रिफ्लेक्टर का निर्माण किया है, जिसे अब भारत के बेंगलुरु भेजा जा रहा है। इस संदर्भ में यह सवाल उठता है कि निसार मिशन क्या है, इसे कब लॉन्च किया जाएगा, और इसमें नासा तथा इसरो की भूमिकाएं क्या हैं? निसार एक ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट है, जिसका उद्देश्य पर्यावरणीय बदलावों और प्राकृतिक आपदाओं की निगरानी करना है। यह सैटेलाइट अपनी उन्नत रडार इमेजिंग तकनीक के माध्यम से धरती के पारिस्थितिकी तंत्र में होने वाले बदलावों, बर्फ के पिघलने, भूकंप, और सुनामी जैसी आपदाओं का आंकलन करेगा। इसके द्वारा संकलित आंकड़ों का उपयोग न केवल वैज्ञानिकों द्वारा किया जाएगा, बल्कि यह मिशन पृथ्वी पर जीवन को बेहतर बनाने और प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को कम करने में भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। कुछ ही दिनों में रडार एंटीना रिफ्लेक्टर बेंगलुरु पहुंच जाएगा, जहां इसे इसरो की एक सुविधा में रडार सिस्टम के साथ पुनः जोड़ा जाएगा। इसके बाद, यह मिशन अपने लॉन्च के करीब एक कदम और बढ़ जाएगा, और इसे 2025 की शुरुआत में लॉन्च किया जाएगा। यह मिशन अंतरराष्ट्रीय स्पेस सहयोग और धरती के ऑब्जर्वेशन के क्षेत्र में एक नए अध्याय की शुरुआत करेगा। रिफ्लेक्टर नासा के इस मिशन में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के साथ सहयोग का एक महत्वपूर्ण योगदान है। नासा और इसरो ने इस सैटेलाइट में क्या योगदान दिया? NISAR सैटेलाइट को 3 से 5 साल तक कार्य करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना के विकास के लिए 2014 में ISRO और NASA के बीच एक एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए गए थे। इस सैटेलाइट में दो अलग-अलग रडार हैं: एक एस-बैंड रडार जिसे ISRO ने विकसित किया है, और दूसरा एल-बैंड रडार, जिसे NASA ने बनाया है। इसरो ने अहमदाबाद के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर में एस-बैंड रडार तैयार किया है, इसके साथ ही सैटेलाइट के लिए स्पेसक्राफ्ट बस और जीएसएलवी लॉन्च सिस्टम भी उपलब्ध कराया है। दूसरी ओर, NASA ने स्पेसक्राफ्ट बस में एल-बैंड रडार, GPS, उच्च क्षमता वाले सॉलिड डेटा रिकॉर्डर और पेलोड डेटा सबसिस्टम जैसे महत्वपूर्ण उपकरण शामिल किए हैं। नासा और इसरो की यह साझेदारी न केवल दोनों देशों, बल्कि अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में सभी के लिए उम्मीदें जगाती है। यह मिशन अंतरराष्ट्रीय सहयोग की शक्ति और विज्ञान में साझेदारी के महत्व को भी दर्शाता है। बाकी सैटेलाइट्स से NISAR कैसे अलग है? इसरो ने 1979 से अब तक 30 से अधिक पृथ्वी ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट्स लॉन्च किए हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य कृषि और मौसम से संबंधित स्पेस डेटा को बेहतर बनाना है। लेकिन NISAR सैटेलाइट विशेष है क्योंकि इसमें सिंथेटिक अपर्चर रडार (SAR) का उपयोग किया गया है, जो अन्य भारतीय सैटेलाइट्स की तुलना में उच्च रिजॉल्यूशन वाली इमेज भेजने में सक्षम है। नासा के अनुसार, NISAR पहला ऐसा सैटेलाइट मिशन है, जिसमें दो अलग-अलग रडार फ्रीक्वेंसी (एल-बैंड और एस-बैंड) का उपयोग किया गया है। यह सैटेलाइट पृथ्वी की क्रस्ट, आइस शीट और इकोसिस्टम से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करेगा, जिससे पर्यावरणीय और भूवैज्ञानिक परिवर्तनों का अध्ययन संभव हो सकेगा। रिपोर्ट्स के अनुसार, इसरो ने इस प्रोजेक्ट पर 788 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, जबकि नासा ने इसमें 808 मिलियन अमेरिकी डॉलर का योगदान दिया है। नासा ने यह भी बताया कि NISAR की इमेजिंग क्षमता इतनी उन्नत है कि यह 150 मील (240 किलोमीटर) चौड़ी पट्टी की तस्वीरें खींच सकता है, जिससे यह सैटेलाइट 12 दिनों में पूरे पृथ्वी की तस्वीरें लेने में सक्षम होगा। इस 2,800 किलोग्राम के सैटेलाइट में 39 फुट का स्थिर एंटीना रिफ्लेक्टर लगा है, जो सोने की परत वाली तार की जाली से बना है। इसका डिजाइन इस तरह से तैयार किया गया है कि यह ऊपर से भेजे और प्राप्त किए गए रडार सिग्नल को कुशलतापूर्वक कैप्चर कर सके। इस सैटेलाइट से तीन से पांच साल तक निरंतर कार्य करने की उम्मीद जताई जा रही है। यह सैटेलाइट न केवल पर्यावरणीय अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि सीमा सुरक्षा में भी अहम भूमिका निभाएगा। इससे प्राप्त होने वाली उच्च रिजॉल्यूशन तस्वीरें हिमालय में ग्लेशियरों की निगरानी में मदद करेंगी, जहां ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। इसके अलावा, यह जलवायु परिवर्तन, टेक्टोनिक शिफ्ट्स, भूस्खलन और ज्वालामुखी विस्फोट के कारण होने वाले भूगर्भीय परिवर्तनों की भी निगरानी करेगा। सैटेलाइट समुद्री तटों पर हो रहे परिवर्तनों और भू-आकृतिक गतिविधियों पर भी नज़र रखेगा, जो प्राकृतिक आपदाओं से जुड़ी घटनाओं का सटीक अध्ययन करने में सहायक होगा। NISAR सैटेलाइट न केवल नागरिक उपयोगों के लिए, बल्कि चीन और पाकिस्तान के साथ भारत की सीमाओं पर भी निगरानी रखने में मददगार साबित हो सकता है, जहां हाल के वर्षों में तनावपूर्ण स्थितियां बनी रही हैं। Read More
अब YouTube पर सीधे शॉपिंग करें, नया शानदार फीचर हुआ लॉन्च Date : 26-Oct-2024 यूट्यूब ने एक नया फीचर लॉन्च किया है, जिसे YouTube Shopping कहा जाता है। इस फीचर के जरिए यूट्यूब यूजर्स को कमाई का मौका मिलेगा, लेकिन इसके उपयोग के लिए कुछ नियम और शर्तें हैं। आइए, विस्तार से जानते हैं। गूगल के स्वामित्व वाले यूट्यूब ने YouTube Shopping फीचर पेश किया है, जो फ्लिपकार्ट और मिंत्रा के साथ साझेदारी में शुरू हुआ है। इस फीचर के तहत, क्रिएटर्स प्रोडक्ट लिस्टिंग करेंगे और वीडियो में लिंक शामिल करेंगे। जब इन प्रोडक्ट्स की बिक्री होगी, तो क्रिएटर्स को कमीशन मिलेगा। इसका मतलब है कि यदि आपके यूट्यूब चैनल पर प्रोडक्ट लिस्ट किया जाता है और उसकी बिक्री होती है, तो आपको कमीशन प्राप्त होगा। YouTube शॉपिंग फीचर का फायदा भारतीय क्रिएटर्स को मिलेगा, जिससे यूट्यूब की कमाई में बढ़ोतरी की उम्मीद है। यह फीचर क्रिएटर्स को अपने वीडियो में प्रोडक्ट टैग करने की अनुमति देता है, साथ ही खरीद पर कमाई का मौका भी प्रदान करता है। यदि आप इस फीचर के लिए पंजीकरण कराना चाहते हैं, तो आपके यूट्यूब चैनल पर 10,000 सब्सक्राइबर्स होना आवश्यक है। रिटेलर्स को उन लिंक्स पर हुई खरीदारी के बाद कमीशन पाने का अवसर मिलेगा। फॉलो करने के लिए आसान टिप्स • सबसे पहले, YouTube खोलें। • फिर YouTube Studio पर क्लिक करें। • यहां बाईं ओर "Earn" का विकल्प दिखाई देगा, उस पर क्लिक करें। इसके बाद "Program" विकल्प पर जाएं। • अब "Join Now" पर क्लिक करें। • इसके बाद "नियम और शर्तें" पर क्लिक करें। • अंत में, आपको नए फीचर का विकल्प मिल जाएगा। बच्चों के लिए बनाए गए यूट्यूब वीडियो से कमाई नहीं होगी। इसके अलावा, यूट्यूब म्यूजिक चैनल, ऑफिशियल आर्टिस्ट चैनल और पब्लिशर चैनल पर भी प्रोग्राम साइनअप का मौका मिलेगा। इस फीचर में प्रोडक्ट टैगिंग का विकल्प होगा, जिसमें एक वीडियो पर अधिकतम 30 आइटम टैग किए जा सकते हैं। क्रिएटर्स लाइव स्ट्रीमिंग के दौरान भी आइटम टैग कर सकेंगे। इसके अतिरिक्त, यूजर्स को "सुपर थैंक्स" का विकल्प भी मिलेगा। यूट्यूब, जो गूगल का प्रोडक्ट है, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना कर रहा है। इसीलिए, यूट्यूब पर नए फीचर्स को सपोर्ट दिया जा रहा है Read More
सैटेलाइट के जरिए अंतरिक्ष से धरती पर सप्लाई होगी बिजली, रोशन होंगे 3000 घर; यह देश करने जा रहा `चमत्कार` Date : 25-Oct-2024 अंतरिक्ष से धरती पर बिजली की सप्लाई? अगर आप कुछ साल पहले ऐसा कहते तो वैज्ञानिक भी हंसने लगते. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अमेरिका, चीन, जापान समेत कई देश आने वाले सालों में ऐसी क्षमता हासिल करने की दिशा में बढ़ रहे हैं. एक ब्रिटिश स्टार्टअप भी 2030 तक स्पेस में मौजूद सैटेलाइट के जरिए पृथ्वी पर बिजली सप्लाई करने जा रहा है. यह कंपनी 2030 तक पहला डिमॉन्स्ट्रेटर सैटेलाइट भेजकर आइसलैंड को बिजली सप्लाई शुरू करना चाहती है. अगर वह सफल रही तो यह दुनिया में इस रिन्यूएबल एनर्जी सोर्स का पहला वाकया होगा. अंतरिक्ष से धरती पर कैसे सप्लाई होगी बिजली? यह स्पेस सोलर पावर प्रोजेक्ट UK की Space Solar, Reykjavik Energy और आइसलैंड के सस्टेनेबिलिटी इनिशिएटिव Transition Labs के बीच साझेदारी है. कंपनी की योजना अगले छह साल में पहला सैटेलाइट लॉन्च करने की है जो धरती पर साफ-सुथरी 30 मेगावॉट ऊर्जा की बीम छोड़ेगा. इतनी बिजली से करीब 3,000 घर रोशन हो सकते हैं. सैटेलाइट से हाई-फ्रीक्वेंसी वाली रेडियो वेव्स के रूप में ऊर्जा भेजी जाएगी. जमीन पर लगे रिसीविंग एंटेना इस ऊर्जा को इकट्ठा करेंगे और उसे बिजली में बदलकर पावर ग्रिड में भेजेंगे. मौसम कैसा भी हो, स्पेस से 24x7 होगी बिजली सप्लाई सोलर पैनल्स को मिलाकर यह सैटेलाइट करीब 400 मीटर चौड़ा होगा. रिपोर्ट के मुताबिक, सैटेलाइट का वजन 70.5 टन हो सकता है. यह पृथ्वी की मध्यम कक्षा में ग्रह की परिक्रमा करेगा. यह कक्षा 2,000 और 36,000 किलोमीटर के बीच की ऊंचाई पर एक निकट-अंतरिक्ष क्षेत्र है. Read More
iPhone 16 का प्रभाव प्रभाव, गेमर्स के मजे के लिए Apple लाने जा रहा नई ऐप Date : 24-Oct-2024 Phone 16 सीरीज के लॉन्च के बाद, Apple एक नए डेडिकेटेड गेमिंग ऐप स्टोर पर काम कर रहा है। यह नया ऐप स्टोर गेम सेंटर को नहीं बदलेगा, बल्कि ऐप स्टोर और गेम सेंटर के कुछ फीचर्स का उपयोग करेगा। इसमें 'Play Now' सेक्शन, गेमिंग इवेंट्स और महत्वपूर्ण अपडेट शामिल होंगे। हाल ही में iPhone 16 सीरीज का अनावरण हुआ है, और Apple नई नवाचारों पर ध्यान दे रहा है। आज हम आपको एक खास अपडेट के बारे में बताने जा रहे हैं। Apple एक नए गेमिंग ऐप स्टोर पर काम कर रहा है, जो गेमर्स के लिए बनाया जा रहा है। iOS 18 में भी कई अपडेट देखने को मिले थे, लेकिन अब Apple डेडिकेटेड गेमिंग ऐप पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। नई ऐप आने की योजना है, और यह गेम सेंटर को प्रतिस्थापित नहीं करेगी। इसके लिए ऐप स्टोर और गेम सेंटर के फीचर्स को लिया जाएगा और एक नई ऐप बनाई जाएगी। ऐप में कई टैब्स होने की उम्मीद है, जिसमें "Play Now" सेक्शन, उपयोगकर्ता के गेम्स और दोस्तों के लिए टैब्स शामिल होंगे। "Play Now" क्षेत्र में उपयोगकर्ता संपादकीय सामग्री, गेम की सिफारिशें, चुनौतियां, लीडरबोर्ड और उपलब्धियों की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे। इसमें App Store और Apple Arcade दोनों के गेम्स शामिल किए जा सकते हैं। इसके अलावा, ऐप में विशेष गेमिंग इवेंट्स और महत्वपूर्ण अपडेट्स को भी हाइलाइट किया जाएगा। रिपोर्टों के अनुसार, Apple FaceTime और iMessage को गेमिंग अनुभव में एकीकृत करने का परीक्षण कर रहा है, जिससे खिलाड़ियों के बीच संवाद करना आसान हो सके। यह भी अफवाह है कि डेवलपर्स को App Clips के माध्यम से मिनी गेम्स बनाने की अनुमति मिलेगी। कुल मिलाकर, यह नया ऐप, जो अभी तक घोषित नहीं हुआ है, iPhone के लिए Xbox ऐप की तरह काम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिससे उपयोगकर्ता अपने गेमिंग स्टेटस, दोस्तों की गतिविधियों को देख सकें, नए गेम्स खोज सकें और अपनी गेम लाइब्रेरी को प्रबंधित कर सकें। Apple इस नए प्रस्ताव के माध्यम से अपने उपकरणों को गेमर्स के लिए और अधिक आकर्षक बनाने का लक्ष्य रख रहा है। Read More
जेमिनी AI एसिस्टेंट यूजर्स को लॉक स्क्रीन से कॉल करने और मैसेज भेजने की सुविधा प्रदान करेगा। Date : 23-Oct-2024 आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) वर्चुअल एसिस्टेंट Gemini AI में नए फीचर्स जोड़े जा रहे हैं। हाल ही में लॉन्च किए गए इस AI एसिस्टेंट में फर्स्ट पार्टी और थर्ड पार्टी ऐप्स के साथ इंटीग्रेशन की कमी देखी गई थी, जिसे टेक दिग्गज ने कई एक्सटेंशन के जरिए सुधारने की कोशिश की है। अब एक नई रिपोर्ट में बताया गया है कि Gemini एंड्रॉइड डिवाइस पर लॉक स्क्रीन से कॉल करने और मैसेज भेजने में सहायता करेगा। आइए जानें Gemini AI की नई सुविधाओं के बारे में। एंड्रॉइड अथॉरिटी की रिपोर्ट के अनुसार, नए Gemini AI एसिस्टेंट फीचर्स को गूगल ऐप के बीटा वर्जन 15.42.30.28.arm64 में देखा गया है। ये फीचर्स वर्तमान में दिखाई नहीं दे रहे हैं और इन्हें एंड्रॉइड एप्लिकेशन पैकेज (APK) के टियरडाउन प्रक्रिया के दौरान खोजा गया। पब्लिकेशन ने इस फीचर का एक स्क्रीनशॉट भी साझा किया है। स्क्रीनशॉट के अनुसार, Gemini की सेटिंग्स में लॉक स्क्रीन मेनू पर एक नया विकल्प "मेक कॉल्स एंड सेंड मैसेज विदआउट अनलॉकिंग" दिखाई दिया है, जिसके साथ एक टॉगल स्विच है। अगर यूजर्स इस सुविधा का उपयोग करना चाहते हैं, तो वे इसे ऑन कर सकते हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि वर्तमान में यूजर्स Google Assistant का उपयोग करके भी लॉक डिवाइस से कॉल और मैसेज भेज सकते हैं। हालांकि, यह नया फीचर AI आधारित वर्चुअल एसिस्टेंट की क्षमताओं को और बढ़ाता है। स्क्रीनशॉट के अनुसार, यूजर्स को निजी कंटेंट वाले मैसेज देखने के लिए अभी भी डिवाइस अनलॉक करना होगा। इसके अलावा, Google कथित तौर पर फ्लोटिंग Gemini टेक्स्ट फील्ड ओवरले में सुधार कर रहा है। साझा किए गए अन्य स्क्रीनशॉट के अनुसार, नया इंटरफेस एक स्लिम टेक्स्ट बॉक्स है, जिसमें "आस्क अबाउट दिस पेज" और "समराइज दिस पेज" के लिए दो अलग-अलग बॉक्स शामिल हैं। यह नया डिज़ाइन वर्तमान में उपलब्ध बड़े फ्लोटिंग बॉक्स की जगह लेगा। पब्लिकेशन का दावा है कि Gemini AI एसिस्टेंट के एक्सटेंशन पेज में भी कुछ बदलाव किए जा रहे हैं। अब सभी एक्सटेंशन को एक ही स्थान पर दिखाने के बजाय, नया डिज़ाइन इन्हें विभिन्न श्रेणियों में विभाजित करेगा, जैसे कि कम्युनिकेशन, डिवाइस कंट्रोल, ट्रैवल, मीडिया, और प्रोडक्टिविटी। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि इन फीचर्स को यूजर्स के लिए कब उपलब्ध कराया जाएगा। Read More
क्या है ? इसरो का एयरो ब्रेकिंग तकनीक जो 4 करोड़ किमी दूर वीनस तक पहुंचेगा Date : 22-Oct-2024 भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) का महत्वाकांक्षी शुक्र ग्रह मिशन 2028 में लॉन्च होने वाला है। इस मिशन में पहली बार एयरो-ब्रेकिंग तकनीक का उपयोग किया जाएगा, जिससे इसरो 4 करोड़ किलोमीटर दूर वीनस तक पहुँच सकेगा। इसरो धरती के जुड़वां ग्रह, वीनस, तक जाएगा। सरकार ने इस महत्वाकांक्षी मिशन को मंजूरी दे दी है, और यह तब लॉन्च किया जाएगा जब धरती और वीनस एक-दूसरे के करीब होंगे। इस मिशन के लिए एयरो-ब्रेकिंग तकनीक का उपयोग पहली बार किया जाएगा। धरती और वीनस के बीच की दूरी लगभग 4 करोड़ किलोमीटर है, और वीनस हमारे सबसे निकटवर्ती ग्रहों में से एक है। यह सौर मंडल का ऐसा ग्रह है जो आकार, द्रव्यमान और घनत्व के मामले में धरती के समान है, हालांकि तापमान और अन्य पहलुओं में उनके बीच महत्वपूर्ण अंतर हैं। सूरज के नजदीकी ग्रह से भी गर्म है वीनस धरती और वीनस एक-दूसरे के समान दिखने के बावजूद, वीनस बहुत गर्म है। वैज्ञानिकों के अनुसार, वीनस का तापमान लगभग 462 डिग्री सेल्सियस है, जो सूरज के करीब स्थित बुध ग्रह से भी अधिक है। ऐसा धरती के मुकाबले वीनस पर अधिक एटमॉस्फेरिक प्रेशर होने के कारण होता है, जो समुद्र की गहराइयों में पाया जाता है। वीनस का वायुमंडल लगभग 96 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड से भरा है, और यह एक चक्कर धरती के 243 दिनों में पूरा करता है। क्या है वीनस ऑर्बिटरी मिशन धरती और वीनस के मास और घनत्व लगभग समान हैं, और माना जाता है कि वीनस पर कभी पानी मौजूद था। वीनस ऑर्बिटरी मिशन के माध्यम से वैज्ञानिक यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि धरती में साल दर साल किस प्रकार के बदलाव हो सकते हैं। इसके लिए एक यान तैयार किया जा रहा है जो सिंथेटिक अपर्चर रडार, इन्फ्रारेड और अल्ट्रावायलेट कैमरा, सेंसर आदि से सुसज्जित होगा, जो वीनस के जलवायु, ज्वालामुखी गतिविधियों और उच्च ऊर्जा कणों पर शोध करेगा। क्या एयरो ब्रेकिंग टेक्नीक, कब होगा लांच एयरो ब्रेकिंग तकनीक एक ऐसी प्रक्रिया है, जिससे किसी स्पेस यान की स्पीड संबंधित ग्रह की ऑर्बिट में उपलब्ध वायुमंडल की मदद से कम की जाती है. इससे ईधन की बचत होती है, क्योंकि यान के थ्रस्टर्स की बजाय संबंधित वायुमंडल के फ्रिक्शन का इस्तेमाल किया जाता है. शुक्र मिशन में पहली बार इसरो एयरो ब्रेकिंग टेक्नीक प्रयोग करने जा रहा है, इसमें पहले स्पेस यान धरती के ऑर्बिट में चक्कर लगाएगा, फिर गुलेल की तरह लांच होकर धरती से शुक्र के सबसे बाहरी ऑर्बिट में पहुंचेगा. इस काम में 140 दिन लगेंगे. इसके बाद यान की एयरो ब्रेकिंग टेक्नीक शुक्र के वायुमंडल और गैसों से इसकी स्पीड कम करेगी, जिससे इसे शुक्र के सबसे नजदीकी ऑर्बिट में जाने में मदद मिलेगी. यह मिशन तब लांच किया जाएगा जब शुक्र ग्रह धरती के करीब होगा. माना जा रहा है कि इसे मार्च 2028 में लांच किया जा सकता है | शुक्र ग्रह पर 2020 में फॉस्फीस गैस मिली थी, उसके बाद अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश शुक्र मिशनों पर फोकस लगाए हैं. दरअसल फॉस्फीन गैस मिलने का अर्थ ये है कि ग्रह पर माइक्रोब्स का जीवन हो सकता है. ऐसे में शुक्र ग्रह पर भी जीवन की संभावनाओं को देखा जा रहा है. अमेरिका, सोवियत यूनियन और यूरोपीय स्पेस एजेंसी तथा जापान पहले ही शुक्र ग्रह के लिए अपने मिशन लांच कर चुके हैं. भारत पहली बार ऐसा करने जा रहा है| क्या है एयरो-ब्रेकिंग तकनीक, कब होगा लॉन्च एयरो-ब्रेकिंग तकनीक एक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से किसी स्पेस यान की गति को संबंधित ग्रह के वायुमंडल की मदद से कम किया जाता है। इससे ईंधन की बचत होती है, क्योंकि यान के थ्रस्टर्स की बजाय वायुमंडल के घर्षण का उपयोग किया जाता है। इसरो अपने शुक्र मिशन में पहली बार एयरो-ब्रेकिंग तकनीक का प्रयोग करेगा। इसमें पहले स्पेस यान धरती की कक्षा में चक्कर लगाएगा, फिर गुलेल की तरह लॉन्च होकर धरती से शुक्र के बाहरी कक्षा में पहुंचेगा। इस प्रक्रिया में लगभग 140 दिन लगेंगे। उसके बाद, एयरो-ब्रेकिंग तकनीक शुक्र के वायुमंडल और गैसों की मदद से यान की गति को कम करेगी, जिससे इसे शुक्र की सबसे निकटवर्ती कक्षा में पहुंचने में मदद मिलेगी। यह मिशन तब लॉन्च किया जाएगा जब शुक्र ग्रह धरती के करीब होगा, और इसे मार्च 2028 में लॉन्च किए जाने की संभावना है। ये देश रेस में शामिल 2020 में शुक्र ग्रह पर फॉस्फीन गैस मिलने के बाद, अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों ने शुक्र मिशनों पर ध्यान केंद्रित किया है। फॉस्फीन गैस मिलने का मतलब है कि ग्रह पर माइक्रोब्स का जीवन हो सकता है, जिससे शुक्र ग्रह पर जीवन की संभावनाओं पर ध्यान दिया जा रहा है। अमेरिका, सोवियत संघ, यूरोपीय स्पेस एजेंसी और जापान पहले ही शुक्र ग्रह के लिए अपने मिशन लॉन्च कर चुके हैं, जबकि भारत पहली बार ऐसा करने जा रहा है। Read More